नेपाल का इतिहास
नेपाल के प्राचीन लिच्छवि राजवंश (Licchavi Dynasty) के राजाओं ने अपने अभिलेखों (शिलालेखों) में स्वयं को सूर्यवंशी लिखा है।
इस संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण और स्पष्ट प्रमाण राजा जयदेव द्वितीय (Jayadeva II) का पशुपतिनाथ मंदिर का शिलालेख (733 ईस्वी) है। इस शिलालेख में राजा जयदेव द्वितीय ने अपनी पूरी वंशावली दी है और खुद को भगवान राम के इक्ष्वाकु (सूर्यवंश) का वंशज बताया है।
इसके अलावा, लिच्छवि वंश के अन्य प्रतापी राजाओं जैसे राजा मानदेव (Manadeva), शिवदेव द्वितीय, और उनके सहयोगी शासक अंशुवर्मा (Anshuvarma) के समय के दस्तावेजों में भी सूर्यवंश या सूर्यवंशी होने का उल्लेख मिलता है।
मुख्य बिंदु:
• राजवंश: लिच्छवि राजवंश (प्राचीन नेपाल का स्वर्णयुग)
• राजा जिन्होंने स्पष्ट वंशावली लिखी: राजा जयदेव द्वितीय (पशुपति शिलालेख)
• मूल: ये राजा मूल रूप से भारत के वैशाली (बिहार) से नेपाल आए थे और स्वयं को सूर्यवंशी क्षत्रिय मानते थे
1. रत्न मल्ल (पहले क्रम के राजा के सबसे छोटे पुत्र) — 31 वर्ष (?)
इन राजा ने कांतिपुर के 12 ठकुरी राजाओं को मार डाला। नेपाल संवत् 611 (विक्रम संवत् 1548) में नुवाकोट के ठकुरी राजा को पराजित किया। इसके बाद पाल्पा के सेन राजा की सहायता से भोटियों को हराया।
इन्हीं राजा के शासनकाल में नेपाल पर पहली बार मुसलमानों ने आक्रमण किया। सोमेश्वरानंद नामक दक्षिण भारतीय ब्राह्मण पशुपतिनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी बने।
इन राजा ने नेपाल संवत् 621 (विक्रम संवत् 1558) में तलेजु मंदिर का निर्माण कराया। साथ ही, नए तामाखानी ठक में सिंह की मूर्ति खुदवाकर बनवाई।
2. अमर मल्ल (पहले क्रम के राजा के पुत्रों में से एक) — 47 वर्ष (?)
इन राजा ने 25 नगरों और गाँवों पर शासन किया। इनके शासनकाल में ललितपाटन (ललितपुर) में गया के मंदिर की शैली पर आधारित एक विशाल मंदिर बनाया गया।
3. सूर्य मल्ल (दूसरे क्रम के राजा के पुत्र)
इन राजा ने भादगाँव (भक्तपुर) की ओर स्थित साँखु और चाँगु पर विजय प्राप्त कर उन्हें अपने राज्य में मिला लिया।
4. नरेंद्र मल्ल (तीसरे क्रम के राजा के पुत्र)

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