संदेश

ब्राह्मण धर्म शिल्पकर्म विद्या

  शिल्पकर्म, शिल्पकार्य करने वाले लोगों को एक तरफ वैदिक धर्म और ब्राह्मण धर्म ग्रंथ साहित्य के अनुसार ब्रह्मा, ब्राह्मण और विश्वकर्मा घोषित किया गया है। दूसरी तरफ कालांतर में आर्य वैदिक धर्म, ब्राह्मण धर्म, हिंदू धर्म द्वारा ब्राह्मण शिल्पकार, शिल्पकर्म, शिल्पकला, वास्तुकला, स्थापत्य विज्ञान, धातु विज्ञान में कार्य दक्षता, महारतता, पारंगतता परमज्ञान प्राप्त शिल्पकर्म और शिल्पकार वर्ग को जाति जन्म वर्ण व्यवस्था के आधार पर अछूत, शूद्र घोषित कर दिया।  शिल्पकर्म की उत्पत्ति वेदांग कल्प के शुल्ब-सूत्र से हुई है और वास्तुकला की उत्पत्ति वेदांग ज्योतिष की संहिता स्कंध से हुई है। वेदांग ग्रंथों का अध्ययन करना ब्राह्मणो का प्रमुख कर्तव्य आदिकाल से रहा है। शुल्ब-सूत्र से यज्ञवेदी (यज्ञकुंड), यज्ञशाला, यज्ञमंडप, यज्ञपात्र, मूर्ति आदि का निर्माण होता हैं। जो ब्राह्मण शुल्ब-सूत्र में निहित शिल्पकर्म नहीं जानता वो ये निर्माण नहीं कर सकता । जो ब्राह्मण शिल्पकर्म नहीं जानता उसे यज्ञ करने का अधिकार भी नहीं है क्योंकि आदिकाल से लेकर अब तक वैदिक यज्ञों में यज्ञशाला, यज्ञमंडप, यज्ञवेदी, यज्ञपात्र...

जौलाजीबी मेला सूर्यवंशी पाल राजवंश askot राजघराने की अनमोल धरोहर

  :-  उत्तराखंड के देव भूमि में  एक प्राचीन जौलजीवी स्थान है, कैलाश मानसरोवर पैदल मार्ग में स्धित पिथौरागढ़ जिले काली- गोरी नदियों के संगम पर लगने वाला जौलजीवी मेला एक ऐतिहासिक, धार्मिक और व्यापारिक उत्सव है। कुमाऊंनी और स्थानीय भाषा में जौल का अर्थ "जोडा " ( दो नदियों) और जीबी का अर्थ ."जीभ "या संगम के आकार को  कहते हैं। जौलजीवी मेले की कहानी और इतिहास (महत्व):- शुभ शुरूआत श्रेय:- शुरुआत  सन् 1914 में अस्कोट के पाल वंशज के राजा और ताल्लुकेदार स्वर्गीय गजेन्द्र बहादुर पाल अयोध्या वंशज क्रमांक 105  ने की थी। धार्मिक महत्व:- जौलजीवी में स्थिति ज्वालेश्वर महादेव के प्राचीन मंदिर और काली- गोरी के नदियों के संगम का वर्णन स्कंद पुराण में भी मिलता है।  ऐसी मान्यता है कि कैलाश मानसरोवर जाने वाले श्रद्धालुओं को इस संगम पर स्नान करने की सलाहदी जाती थी।    प्रारंभ में यह स्थान एक छोटे धार्मिक समागय के रुप में जाना जाता है। व्यापारिक केन्द:-  धीरे धीरे यह स्थान भारत ( कुमाऊं के तराई क्षेत्रों) नेपाल,तिब्बत के व्यापारिक के मिलन का केन्द्र बन गया। ऊनी ...

नेपाल का इतिहास

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 नेपाल के प्राचीन लिच्छवि राजवंश (Licchavi Dynasty) के राजाओं ने अपने अभिलेखों (शिलालेखों) में स्वयं को सूर्यवंशी लिखा है। इस संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण और स्पष्ट प्रमाण राजा जयदेव द्वितीय (Jayadeva II) का पशुपतिनाथ मंदिर का शिलालेख (733 ईस्वी) है। इस शिलालेख में राजा जयदेव द्वितीय ने अपनी पूरी वंशावली दी है और खुद को भगवान राम के इक्ष्वाकु (सूर्यवंश) का वंशज बताया है। इसके अलावा, लिच्छवि वंश के अन्य प्रतापी राजाओं जैसे राजा मानदेव (Manadeva), शिवदेव द्वितीय, और उनके सहयोगी शासक अंशुवर्मा (Anshuvarma) के समय के दस्तावेजों में भी सूर्यवंश या सूर्यवंशी होने का उल्लेख मिलता है। मुख्य बिंदु: • राजवंश: लिच्छवि राजवंश (प्राचीन नेपाल का स्वर्णयुग) • राजा जिन्होंने स्पष्ट वंशावली लिखी: राजा जयदेव द्वितीय (पशुपति शिलालेख) • मूल: ये राजा मूल रूप से भारत के वैशाली (बिहार) से नेपाल आए थे और स्वयं को सूर्यवंशी क्षत्रिय मानते थे  1. रत्न मल्ल (पहले क्रम के राजा के सबसे छोटे पुत्र) — 31 वर्ष (?) इन राजा ने कांतिपुर के 12 ठकुरी राजाओं को मार डाला। नेपाल संवत् 611 (विक्रम संवत् 1548) में नुवाक...

अस्कोट पालवंश के पुरोहित

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 अस्कोट  पालवंश के पुरोहित [गोत्र/नाम अस्पष्ट] के मैथिल ब्राह्मण थे। कात्यूरी राजवंश के कुलगुरु यही थे। अस्कोट पाल वंश के गुरु यही थे। गोपीचन्द्र ने राजाराज्यपाल का वध किया। [राज्यपाल के उत्तराधिकारी/अन्य शब्द अस्पष्ट] ने भीम अवस्थी को पुरोहित और [अस्पष्ट] को ग्रामपति नियुक्त बनाया। [अन्तिम वाक्यका केही शब्द अस्पष्ट छन्।] भारद्वाज गोत्र के अवस्थी ब्राह्मण अवस्थी ब्राह्मण अस्कोट राजाओं के पुरोहित हैं। अर्कोट के अवस्थियों का मूल पुरुष [नाम अस्पष्ट] अवस्थी अपने पुत्र जगन्नाथ को लेकर नेपाल में अर्कोट आया। पाल राजा ने विजयग्राम देकर बसाया। भीम अवस्थी को [स्थान अस्पष्ट] में पुरोहित बनाया। भीम के पौत्र रसेदेव को पाल राजा ने नरता ग्राम दिया। रसेदेव के प्रपौत्र भवानी और भार्गव प्रसिद्ध विद्वान हुए। पं. भार्गव अवस्थी ने मेघदूत काव्य की टीका बनाई है। [अगाडिको नाम अस्पष्ट] के पुत्र भानुदेव, ब्राह्मण वंशज थे। [अस्पष्ट] अवस्थी अमरपाल राजा के साथ डोटी-युद्ध में गया। डोटी वालों ने मार डाला। पं. [नाम अस्पष्ट] अवस्थी प्रसिद्ध ज्योतिषी थे। उनका पुत्र पुरुषोत्तम अवस्थी भी अच्छा ज्योतिषी हुआ। पुर...

गंगोली के मणकोटी राजा - पूरा लेख

ओडिशा राजा ओद् ने बसाया व अपने नाम पर ओड्वंश

 ओड़िशा का इतिहास प्राचीन इतिहास ओडिशा राजा ओद् ने बसाया व अपने नाम पर ओड्वंश च्लाया जौ भागीरथवंश थे २६१ ई. पू. ओडिशा का धुंधला भूत बौद्ध कलिंग पर अशोक महान की चढ़ाई बताता है। अशोक मगध का शक्तिशाली सम्राट था। दस लाख से अधिक लोग मारे गये, पंद्रह लाख से अधिक बंदी हुए और इतने ही लोग युद्ध के बाद में मृत्यु को प्राप्त हुए। इस महान हत्या काण्ड ने अशोक को ऐसा विचलित किया, कि उसने भविष्य में कदापि कोई युद्ध ना करने का निर्णय लिया। उसने अहिंसा की राह पर चलना आरम्भ किया, एवं बौद्ध धर्म अपनाया। बौद्ध धर्म उसके राज्य में बहुत फैला और राज्य भर में फैल गया। २३२ ई. पू. अशोक की मृत्यु। मौर्य वंश १८५ ई.पू. तक चला। प्रथम शताब्दी ई. पू. कलिंग मौर्य शासन से निकल गया। वहां चेदि वंश के प्रथम राजा महामेघवाहन ने आरम्भिक प्रथम शताब्दी में राज्य किया। ४९ ई. पू. तृतीय चेदी राजा खारवेल आसीन हुआ और उसने अत्यधिक सैन्य गतिविधियां आरम्भ कीं। उसकी शक्ति की महानता भारत के पूर्व से पश्चिमी छोर तक फैली। उत्तर में मथुरा से दक्षिण]] में पांड्या वंश के राज तक। उसके राज्य में बौद्ध धर्म ओर  जैन धर्म फला-फूला। द्वित...

बच्छिल (बाछिल/बच्हल) क्षत्रिय (राजपूत): इतिहास, परंपरा और ऐतिहासिक साक्ष्य

 बच्छिल (बाछिल/बच्हल) क्षत्रिय (राजपूत): इतिहास, परंपरा और ऐतिहासिक साक्ष्य बच्छिल (Bachhil/Bachhal/Bachhil) राजपूत उत्तर भारत का एक प्राचीन राजपूत कुल माना जाता है। इनका प्रमुख निवास वर्तमान उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर, बदायूँ, खीरी, सीतापुर, मुरादाबाद, बुलंदशहर तथा मथुरा क्षेत्रों में रहा है। इनके इतिहास का आधार स्थानीय परंपराएँ, भाट-चारणों की वंशावलियाँ, ब्रिटिशकालीन गजेटियर तथा औपनिवेशिक काल के राजपूत कुल-वर्णन हैं। हालांकि इनके प्रारम्भिक इतिहास के अनेक दावे ऐतिहासिक रूप से पूर्णतः सिद्ध नहीं हैं। बच्छिल नाम की उत्पत्ति बच्छिल, बाछिल, बच्हल अथवा Bachhal एक ही राजपूत कुल के विभिन्न रूप माने जाते हैं। विभिन्न क्षेत्रों में इनके नाम का उच्चारण अलग-अलग मिलता है। वंश परंपरा राजपूतों की पारंपरिक 36 शाही कुलों की वंशावलियों में बच्छिलों को सामान्यतः चंद्रवंशी (सोमवंशी) शाखा में रखा जाता है। कुछ भाट-चारण परंपराओं में इन्हें **तोमर (तंवर) वंश** की एक उपशाखा भी माना गया है। यह परंपरागत वंशावली है; इसका कोई प्रारम्भिक अभिलेखीय (शिलालेख/ताम्रपत्र) प्रमाण अभी तक उपलब्ध नहीं है। राजा वेन से ...