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राजपूतों का इतिहास केवल बाद के समय की पांडुलिपियों पर ही आधारित नहीं है

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राजपूतों का इतिहास केवल बाद के समय की पांडुलिपियों पर ही आधारित नहीं है —बल्कि यह शिलालेखों, सिक्कों के अध्ययन (मुद्राशास्त्र), और उस समय की लिखित परंपराओं पर मज़बूती से टिका हुआ है। 🪨 पुरालेखीय प्रमाण (सल्तनत-पूर्व काल) राजपूतों के वंशों का ज़िक्र राज्य द्वारा जारी किए गए शिलालेखों में मिलता है, जो पत्थरों और तांबे की प्लेटों पर उकेरे गए हैं—ये बाद के कवियों द्वारा लिखे गए ग्रंथों की तुलना में कहीं अधिक टिकाऊ और उसी समय के समकालीन प्रमाण हैं: • शंकरगण का अभोना शिलालेख (लगभग 597 ईस्वी) – कलचुरी वंश • महाशिवगुप्त बालार्जुन का सिरपुर लक्ष्मण मंदिर शिलालेख (7वीं सदी की शुरुआत, ईस्वी) – सोमवंशी वंश • प्रतिहार राजपूतों का विदिशा शिलालेख (लगभग 5वीं सदी ईस्वी, गुप्त काल) • कुमारगुप्त प्रथम के शासनकाल का शिलालेख (लगभग 397–398 ईस्वी), जिसमें भाटी राजपूत वंश का ज़िक्र है • यज्वापाल गोपाल का बाराउदी शिलालेख, जिसमें गौरहारा (गौडहारा) / गौर क्षत्रिय का उल्लेख है • कुंडा शिलालेख (661 ईस्वी), जिसमें शुरुआती गुहिल शासक अपराजित (गेहलोत राजपूत वंश) का ज़िक्र है • तोमर राजपूत सरदार गोग्गा का पेहोवा शिला...

अमोढ़ा राजा जालिम सिंह का गौरवशाली इतिहास ==========================

 अमोढ़ा राजा जालिम सिंह का गौरवशाली इतिहास  ========================== भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास जिन अमर शहीदों के लहू से लिखा गया, उनमें देश की आधी आबादी ने भी अपना योगदान दिया था।और इस विद्रोह के अन्त में ईस्ट इंडिया कम्पनी का भारत में शासन खत्म हो गया तथा ब्रिटेन सरकार का प्रत्यक्ष शासन प्रारम्भ हो गया जो कि अगले 90 सालों तक चला। 1857 के विद्रोह में सिर्फ़ बेग़म हज़रत महल और रानी लक्ष्मीबाई ने ही हिस्सा नहीं लिया था,मगर इस तथ्य से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि आज़ादी की लड़ाई में कंधे से कंधा मिला कर जिन गुमनाम क्रांतिवीरों तथा वीरांगनाओं ने सहयोग और समर्थन दिया, उनका तो कहीं जिक्र भी नहीं मिलता। दुर्भाग्य से उनमें से ज्यादातर को भुला दिया गया। जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष में अपना सर्वस्व बलिदान किया और देश की जनता पर अमिट छाप छोड़ी। ऐसा ही एक अलिखित और अनछुआ मगर गौरवशाली इतिहास अयोध्या और बस्ती के बीच रामजानकी मार्ग पर बसा हुआ अति प्राचीन अमोढ़ा नामक राज्य का है। तो दोस्तों,आइए अमोढ़ा राज्य का इतिहास ,भूगोल, उसकी स्थापना, सामाजिक संरचना, उसकी विकास यात्रा तथा...

मेवाड बंशावलिमा भगवान गौतम बुद्ध पनि रहेका छन् । एकचोटी गहन मिहिन अध्ययन गरौ । इतिहास कहि न कहि कनेक्सन छ ।

 मेवाड बंशावलिमा भगवान गौतम बुद्ध पनि रहेका छन् । एकचोटी गहन मिहिन अध्ययन गरौ । इतिहास कहि न कहि कनेक्सन छ ।  MeWar Banswali (Shudhyod or Gautam Buddha  575 B.C.E . )  To the Shakya King in Kapilavastu was born Shudhyodh or Gautam Buddha, a Prince among Princes.  1. Aditya Narayan 4050 B.C.E In the highest heaven, it is said dwelled and reigned those Gods who bore in common the name of Adityas... These Gods were inviolable, imperishable, eternal beings and their essence was the celestial light. They were considered to be the eternal sustainers of the luminous life, which existed behind all phenomena. Aditya Narayan was The supreme soul, and the self-existent Lord.He created the waters and deposited in them a seed, which eventually became a golden egg, in which He Himself was born as Brahma.  2. Brahma 4025 B.C.E. From the Golden Egg Aditya Narayan emerged as Brahma who was and is still considered the progenitor of all the worlds as per Hindu mythology....

कुमायूं में अवध से सूर्यवंशी कत्यूरियों का आगमन

 चित्रशिला :- रानी बाग में राजमाता जिया रानी का जो गुफा है उसका सुंदरीकरण का निर्माण कार्य चल रहा है मानस खंड में गोला नदी का महत्व गंगा नदी के समान है मकर संक्रांति के दिन यहां पर गंगा स्नान करना बहुत पुण्य कार्य माना जाता है रानी बाग को जय जिया रानी  पड़ाव नाम से भी जाना जाता है (जैजिया ठाऊ) शिव मन्दिर से कुछ ही ऊपर एक छोटी सी गुफा है। कुमाऊँ का इतिहास में श्री बदरी दत्त जी लिखते है रानीबाग में कत्यूरी राजा धामदेव की माता जिया रानी का बाग था। कहते है यहाँ गुफा में जिया रानी ने तपस्या की थी। कत्यूरियों का यह पवित्र तीर्थ है। जिया रानी पृथ्वी पाल की पत्नी थी स्कन्दपुराण मुख्य रूप से भूगोल का वर्णन करता है और उसका मानस खण्ड हिमालय के इसी अंचल का वर्णन करता है- जो नेपाल के पश्चिम, केदार खण्ड (गढ़वाल) से पूर्व तथ कैलाश के दक्षिण में है। स्पष्ट है कि मानस खण्ड का वर्ण्य- वर्तमान कूर्माचल या कुमायूं प्रदेश ही है। और कुमायूं प्रेदेश ही है। और कुमायूं में कोई अन्य गार्गी, पुष्पभद्रा, चित्रशिला, चित्रन्हद भद्रवट तथा मार्कण्डेयाश्राम नहीं हैं। अतः पुराणों को पुष्पभद्र, गार्गी चित्रशिला,...