ब्राह्मण धर्म शिल्पकर्म विद्या
शिल्पकर्म, शिल्पकार्य करने वाले लोगों को एक तरफ वैदिक धर्म और ब्राह्मण धर्म ग्रंथ साहित्य के अनुसार ब्रह्मा, ब्राह्मण और विश्वकर्मा घोषित किया गया है। दूसरी तरफ कालांतर में आर्य वैदिक धर्म, ब्राह्मण धर्म, हिंदू धर्म द्वारा ब्राह्मण शिल्पकार, शिल्पकर्म, शिल्पकला, वास्तुकला, स्थापत्य विज्ञान, धातु विज्ञान में कार्य दक्षता, महारतता, पारंगतता परमज्ञान प्राप्त शिल्पकर्म और शिल्पकार वर्ग को जाति जन्म वर्ण व्यवस्था के आधार पर अछूत, शूद्र घोषित कर दिया। शिल्पकर्म की उत्पत्ति वेदांग कल्प के शुल्ब-सूत्र से हुई है और वास्तुकला की उत्पत्ति वेदांग ज्योतिष की संहिता स्कंध से हुई है। वेदांग ग्रंथों का अध्ययन करना ब्राह्मणो का प्रमुख कर्तव्य आदिकाल से रहा है। शुल्ब-सूत्र से यज्ञवेदी (यज्ञकुंड), यज्ञशाला, यज्ञमंडप, यज्ञपात्र, मूर्ति आदि का निर्माण होता हैं। जो ब्राह्मण शुल्ब-सूत्र में निहित शिल्पकर्म नहीं जानता वो ये निर्माण नहीं कर सकता । जो ब्राह्मण शिल्पकर्म नहीं जानता उसे यज्ञ करने का अधिकार भी नहीं है क्योंकि आदिकाल से लेकर अब तक वैदिक यज्ञों में यज्ञशाला, यज्ञमंडप, यज्ञवेदी, यज्ञपात्र...