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कुमायूं में अवध से सूर्यवंशी कत्यूरियों का आगमन

 चित्रशिला :- रानी बाग में राजमाता जिया रानी का जो गुफा है उसका सुंदरीकरण का निर्माण कार्य चल रहा है मानस खंड में गोला नदी का महत्व गंगा नदी के समान है मकर संक्रांति के दिन यहां पर गंगा स्नान करना बहुत पुण्य कार्य माना जाता है रानी बाग को जय जिया रानी  पड़ाव नाम से भी जाना जाता है (जैजिया ठाऊ) शिव मन्दिर से कुछ ही ऊपर एक छोटी सी गुफा है। कुमाऊँ का इतिहास में श्री बदरी दत्त जी लिखते है रानीबाग में कत्यूरी राजा धामदेव की माता जिया रानी का बाग था। कहते है यहाँ गुफा में जिया रानी ने तपस्या की थी। कत्यूरियों का यह पवित्र तीर्थ है। जिया रानी पृथ्वी पाल की पत्नी थी स्कन्दपुराण मुख्य रूप से भूगोल का वर्णन करता है और उसका मानस खण्ड हिमालय के इसी अंचल का वर्णन करता है- जो नेपाल के पश्चिम, केदार खण्ड (गढ़वाल) से पूर्व तथ कैलाश के दक्षिण में है। स्पष्ट है कि मानस खण्ड का वर्ण्य- वर्तमान कूर्माचल या कुमायूं प्रदेश ही है। और कुमायूं प्रेदेश ही है। और कुमायूं में कोई अन्य गार्गी, पुष्पभद्रा, चित्रशिला, चित्रन्हद भद्रवट तथा मार्कण्डेयाश्राम नहीं हैं। अतः पुराणों को पुष्पभद्र, गार्गी चित्रशिला,...
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कार्तिकेय पुर साम्राज्य का एक झलक

 

तालेश्वर महादेव मंदिर: एक प्राचीन रहस्य का पिटारा*

 🔱 *तालेश्वर महादेव मंदिर: एक प्राचीन रहस्य का पिटारा*   ​श्री तालेश्वर महादेव मंदिर , जो उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में कुमाऊं और गढ़वाल की सीमा के पास स्थित है, सिर्फ एक पूजा स्थल नहीं है, बल्कि इतिहास और पुरातत्व का एक अप्रतिम खजाना है। ​ *पुरातात्त्विक विश्लेषण का सार*  ​पुरातात्विक विश्लेषण हमें यह बताता है कि यह मंदिर और इसके आस-पास का क्षेत्र बहुत प्राचीन सभ्यता का गवाह रहा है। खुदाई और खोजबीन में मिली चीजें इस क्षेत्र के इतिहास को समझने में मदद करती हैं: ​ *ताम्रपत्रों की खोज (छठी शताब्दी):*  ​सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक खोज 1915 और 1963 में मिले दो ताम्रपत्र हैं। ये ताम्रपत्र छठी शताब्दी के आसपास के हैं और इन्हें पौरव वंश के राजाओं (जैसे द्वितीवर्मन और विष्णुवर्मन) के शासनकाल में जारी किया गया था। ​ये ब्रह्म लिपि में लिखे गए हैं, जो उस समय की लिखावट और राज-प्रशासन की अमूल्य जानकारी देते हैं। ​इनमें 'ब्रह्मपुर' और 'कार्तिकेयपुर' जैसे प्राचीन स्थानों का उल्लेख है, जिनकी पहचान अब आधुनिक कुमाऊं क्षेत्र से की जाती है। ​ *प्राचीन मूर्तियाँ और अवशेष* (तीसरी-चौथी श...

कार्तिकेयपुर राजवंश के हरिहरपुर स्टेट जगत बहादुर पाल और उनके पुत्र दान बहादुर पाल का इतिहास

 जगत बहादुर पाल और उनके पुत्र दान बहादुर पाल का इतिहास आपके प्रश्न के आधार पर, मैंने उपलब्ध ऐतिहासिक और स्थानीय स्रोतों (मुख्य रूप से कत्यूरी पाल राजवंश की वंशावली और हरिहरपुर-महुली के क्षेत्रीय इतिहास) से जानकारी संकलित की है। हरिहरपुर (महुली, बस्ती जनपद, उत्तर प्रदेश) के पाल परिवार को कत्यूरी सूर्यवंशी क्षत्रिय राजवंश की एक प्रमुख शाखा माना जाता है, जो प्राचीन कत्यूरी साम्राज्य (उत्तराखंड से जुड़े) के वंशज हैं। यह परिवार 17वीं शताब्दी से स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली रहा, और ब्रिटिश काल में जमींदारी/तालुकदारी व्यवस्था के तहत "मालगुजार" (बड़े जमींदार) के रूप में जाना गया। "बड़े दरबारी" का उल्लेख संभवतः अवध या ब्रिटिश दरबार में उनके प्रभाव या मान्यता को इंगित करता है। नीचे विस्तार से जानकारी दी गई है: परिवार की वंशावली और पृष्ठभूमि - कुंवर राय कन्हैया बक्स पाल बहादुर**: हरिहरपुर पाल वंश के प्रमुख पूर्वज, जो हरिहरपुर राज्य के संस्थापक कुंवर करण पाल देव (1609 ई. में राज्य स्थापित) के वंशज थे। उनके तीन पुत्र थे:   - जगत बहादुर पाल प्रतिष्ठित क्षत्रिय राजा, जिन्हें हरिहरपु...

Subhiksha राजदेव द्वारा कार्तिकेय पर राजवंश के सूर्यवंशी पूर्वज होने का प्रमाण

 

दिव्य संत की समाधि

 दिव्य संत की समाधि मां मानिला मन्दिर के दिव्य संत की समाधि, मां मानिला मन्दिर के पश्चिम में  सामने वाले जंगल की छोटी पहाड़ी पर करीब दो तीन सौ मीटर पर स्थित है यह समाधि संभवतः तीन चार सौ वर्ष पुरानी है जिसका सही समय ज्ञात नहीं है यह समाधि एक ऐसे संत की है जिन्हें भगवान तुल्य किसी दिव्य महाविभूति संत के दर्शन हुए         कहा जाता है कि संत जी मां मानिला मन्दिर के अग्नि कुंड के पास में सायंकाल में बैठे थे तभी वहां पर एक दिव्य संत का आगमन हुआ उन्होंने आजकल की चाय जैसे किसी पेय को बनाने के लिए कहा जिसकी सामग्री मां मानिला में रहने वाले संत जी के पास नहीं थी और उन्होंने वह पेय बनाने में असमर्थता प्रकट की दिव्य संत के आग्रह पर उन्होंने वर्तन में पानी गर्म करने के लिए अग्निकुंड पर  रख दिया और दिव्य संत जी ने प्रत्येक सामग्री के बदले अपने चिमटे की नोक से अग्नि कुंड से थोड़ी भस्म उठाई और गर्म जल में डालते गये और वह पेय पूर्ण रुप में तैयार हो गया और दोनों संतो ने उस पेय को माता को भोग लगाकर ग्रहण किया        तत्पश्चात मां मानिला के संत ज...

कत्यूरी ध्वज

 कत्यूरी ध्वज बाहरी सफेद रंग: जीत, शान्ति का प्रतीक व पित्रों से प्रेम का द्योतक  है दो तिकोने: इसमें हमेशा ऊपरी तिकोना नीचे वाले तिकोने से थोड़ा छोटा होता है जो किसी साम्राज्य  को बताता है एक तिकोने वाले झंडे अक्षरशः किसी मन्दिर के ध्वज को बताता है जैसे बद्रीनाथ आदि केशरिया रंग: यह उदीयमान सूर्य, अग्नि आदि को प्रदर्शित  करता है और राजा राम , श्री कृष्ण  जी का ध्वज भी केशरिया ही था सनातन धर्म  का रंग है जो खुशी हर्ष को बताता है केसरिया रंग त्याग, बलिदान, ज्ञान, शुद्धता एवं सेवा का प्रतीक है। शिवाजी की सेना का ध्वज, राम, कृष्ण और अर्जुन के रथों के ध्वज का रंग केसरिया ही था। चित्त क्षोम और रात्रि अंधता में इस रंग का प्रयोग लाभदायक होता है केसरिया या भगवा रंग शौर्य, बलिदान और वीरता का प्रतीक भी है। भगवा या केसरिया सूर्योदय और सूर्यास्त का रंग भी है अग्निदेव का रंग भी है अर्थात सभी प्रकार  की अशुद्धता को भस्म  करता है और नवचेतन व प्रकाश का प्रतीक है  ॐ: सम्पूर्ण  ब्रह्माण्ड  को बताता है अतः उस परब्रह्म परमेश्वर  की कृपा हमेशा बनी र...