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बच्छिल (बाछिल/बच्हल) क्षत्रिय (राजपूत): इतिहास, परंपरा और ऐतिहासिक साक्ष्य

 बच्छिल (बाछिल/बच्हल) क्षत्रिय (राजपूत): इतिहास, परंपरा और ऐतिहासिक साक्ष्य बच्छिल (Bachhil/Bachhal/Bachhil) राजपूत उत्तर भारत का एक प्राचीन राजपूत कुल माना जाता है। इनका प्रमुख निवास वर्तमान उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर, बदायूँ, खीरी, सीतापुर, मुरादाबाद, बुलंदशहर तथा मथुरा क्षेत्रों में रहा है। इनके इतिहास का आधार स्थानीय परंपराएँ, भाट-चारणों की वंशावलियाँ, ब्रिटिशकालीन गजेटियर तथा औपनिवेशिक काल के राजपूत कुल-वर्णन हैं। हालांकि इनके प्रारम्भिक इतिहास के अनेक दावे ऐतिहासिक रूप से पूर्णतः सिद्ध नहीं हैं। बच्छिल नाम की उत्पत्ति बच्छिल, बाछिल, बच्हल अथवा Bachhal एक ही राजपूत कुल के विभिन्न रूप माने जाते हैं। विभिन्न क्षेत्रों में इनके नाम का उच्चारण अलग-अलग मिलता है। वंश परंपरा राजपूतों की पारंपरिक 36 शाही कुलों की वंशावलियों में बच्छिलों को सामान्यतः चंद्रवंशी (सोमवंशी) शाखा में रखा जाता है। कुछ भाट-चारण परंपराओं में इन्हें **तोमर (तंवर) वंश** की एक उपशाखा भी माना गया है। यह परंपरागत वंशावली है; इसका कोई प्रारम्भिक अभिलेखीय (शिलालेख/ताम्रपत्र) प्रमाण अभी तक उपलब्ध नहीं है। राजा वेन से ...

महाराजा विक्रमादित्य और सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय के बीच मुख्य संबंध

 महाराजा विक्रमादित्य और सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय के बीच मुख्य संबंध **'विक्रमादित्य' की उपाधि** और उनके द्वारा **शकों पर प्राप्त विजय** है, हालांकि वे इतिहास के दो अलग-अलग कालखंडों के शासक थे। स्रोतों के आधार पर उनके संबंधों और अंतर को निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है: *   **अलग-अलग समय काल:** महाराजा विक्रमादित्य **पहली शताब्दी ईसा पूर्व** (लगभग 82 ई.पू. से 19 ईस्वी) के शासक थे, जिन्होंने 57 ई.पू. में **विक्रम संवत** की शुरुआत की थी। इसके विपरीत, सम्राट **चंद्रगुप्त द्वितीय** गुप्त वंश के शासक थे जो उनके लगभग **300 से 400 वर्ष बाद** (चौथी शताब्दी ईस्वी में) हुए थे। *   **नाम बनाम उपाधि:** पहली शताब्दी ई.पू. के शासक का जन्म का नाम ही **विक्रमादित्य** था, और उनके पिता राजा गंधर्वसेन थे। दूसरी ओर, चंद्रगुप्त द्वितीय ने अपनी महानता और वीरता के कारण **'विक्रमादित्य' की उपाधि धारण की थी**। *   **शकों पर विजय (शकारि):** दोनों ही शासकों को **'शकारि'** (शकों का शत्रु) कहा जाता है। मूल विक्रमादित्य ने पहली शताब्दी ई.पू. में शकों को पराजित कर भारत को उनक...

उज्जैन के महाराजा विक्रमादित्य

 उज्जैन के महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ और पुरातत्वविदों के शोध के अनुसार, राजा विक्रमादित्य से जुड़े कुछ बेहद महत्वपूर्ण और नए पुरातत्व साक्ष्य (Archaeological Evidence) मिले हैं:1. उज्जैन से मिला सोने का प्राचीन सिक्काहाल के वर्षों में उज्जैन में क्षिप्रा नदी के तट से एक छोटा सोने का सिक्का मिला है। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, इस सिक्के के एक तरफ राजा विक्रमादित्य का चेहरा (चित्र) बना हुआ है और दूसरी तरफ ईसा पूर्व पहली शताब्दी (1st Century BCE) के पारंपरिक चिन्ह बने हैं। शोधकर्ता इसे राजा विक्रम का सबसे बड़ा ठोस सबूत मानते हैं।2. 'राजा विक्रम' और 'कृत' लिखे सिक्केजयपुर और उज्जैन के मुद्रा संग्रहकर्ताओं को प्राचीन सिक्के मिले हैं, जिन पर प्राचीन लिपि में "राजा विक्रम" और "कृत" लिखा हुआ है। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, लिपि विशेषज्ञों ने जांच में पाया कि इतिहास में विक्रमादित्य को ही 'कृत' भी कहा जाता था और इन सिक्कों से उनके अस्तित्व की पुष्टि होती है।3. गढ़कालिका से मिट्टी की मुहरसाल 1975 में प्रसिद्ध पुरातत्वविद् पद्मश्री...

मौर्य वंश सूर्यवंश है

 सुतः कश्यपोभू -- तदनु मनुरभूत्तत्द्युतात्सूर्यवंश:। विख्यात: सर्वलोकेष्वमल नृपगुणैरन्वित:कीर्तिधर्मौर्म्मान्धातुर्भूमिपालात्स कलगुणनिधेन्मौर्य वंशो इस पंक्ति से मनु, मान्धाता, मोर्यवंश तथा सूर्यवंश का ऐक्य अथवा समानाधिकरण सिद्ध होता है। इसी अभिलेख में वाघली के अन्य मौर्यवंशी राजाओं के नाम भी हैं जैसे - कीकट मौर्य, तक्षक मौर्य, भीम मौर्य, गौविंदराज मौर्य आदि अभिलेख में मौर्य प्रसाद में ब्राह्मणों को संरक्षण तथा जगह जगह भगवान शिव की स्तुति है जिसे तीसरी पंक्ति में भी देखा जा सकता है। अत: इस अभिलेख से सिद्ध होता है कि मौर्यवंशी सूर्यवंशी क्षत्रिय है