नागवंशी क्षत्रिय कोलिय कुल की उत्तपत्ति

 [नागवंशी क्षत्रिय कोलिय कुल की उत्तपत्ति] नागवंशी क्षत्रिय कोलिय कुल की उत्तपत्ति के प्रथम प्रमाण "पृथ्वी विजयते श्री मान्धाता भगवान" के समय/त्रेतायुग से मिलते हैं। श्री मान्धाता कोलिय कुल के मूल पुरुष है। श्री मान्धाता का जन्म त्रेतायुग मै सूर्यवंश के इक्ष्वाकु कुल मै हुआ। त्रेतायुग में इसी कुल की शाखा रघुकुल की 25वी  पीढ़ी में भगवान श्री राम और कलयुग में इसी कुल की शाखा कोलिय/शाक्य कुल मै भगवान श्री गौतम बुद्ध का जन्म हुआ।


[ओंकारेश्वर मंदिर, उखीमठ, रुद्रप्रयाग , उत्तराखंड] ओंकारेश्वर मंदिर का एक नाम मान्धाता भी है। यद्यपि आज यह नाम प्रचलित नहीं है किन्तु आज भी भगवान श्री केदारनाथ की बहियों का प्रारम्भ जय श्री मान्धाता से ही होता है। ओंकारेश्वर मंदिर में, भगवान ओंकारेश्वर के साथ भगवान मान्धाता की मूर्ति भी आदिकाल से विराजमान है। ओंकारेश्वर मंदिर जिस पर्वत पर स्थित है, उस पर्वत को मांधाता पर्वत के नाम से जाना जाता है। सर्दियों के दौरान, केदारनाथ मंदिर से मूर्तियों को ओंकारेश्वर/उखीमठ लाया जाता है और भगवान केदारनाथ की शीतकालीन पूजा और भगवान ओंकारेश्वर की साल भर की पूजा भगवान श्री मांधाता के साथ यहाँ की जाती है। मोहनजोदारो सभ्यता के शिलालेखों पर स्पष्ट रूप से "श्री मान्धाता कोलिय वंश" लिखा हुआ है। भगवान श्री केदारनाथ का एक नाम कोलियनाथ भी है।


[राजकुमार सिद्धार्थ वशिष्ठ- तथागत बुद्ध] भगवान श्री गौतम बुद्ध मातृ पक्ष (मायादेवी) से नागवंशी/कोलिय व पितृ पक्ष (महाराज सुद्धोधन) सूर्यवंशी/शाक्य से है। 


शाक्य मुनिस्तु यः ॥ १४॥ शाक्यसिंहः । सर्वार्थ सिद्धाः शौद्धौदनिश्चसः । गौतमश्चार्क बन्धुश्च मायादेवी सुतश्च सः ॥


(आप को मालूम होना चाहिए की हर एक नाम के पीछे जो "सिंह" शब्द लगाया जाता है । इतिहास/भूतकाल में सर्वप्रथम शाक्यसिंह का ही नाम पाया जाता है।  बाद में दूसरे राजाओं/व्यक्तियों के नाम में 'सिंह ' शब्द जानने में आया।)


सम्पूर्ण जम्बूदीप/अखंड भारत मै और नेपाल, भूटान, चीन, थाईलैंड, बंगलादेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, म्यांमार, ईरान, श्री लँका, जापान, मलेशिया ओर जँहा तक विश्व में तथागत बुद्ध को मानने या जानने वाले मनुष्य हैं, वँहा-वँहा क्षत्रिय कोलियों के पद/प्रतीक चिह्न/निशान/इतिहास/शिलालेख मिलते हैं।


प्राचीन पाली, बौद्ध, जैन, पारसी, हिंदी, बंगला, सिंहली, नेपाली, जापानी, चीनी भाषा एवं वेद, पुराण, दुर्गा सप्तशती, रामायण, महाभारत आदि धर्म ग्रंथों/साहित्यों/इतिहासिक पुस्तकों मै " नागवंशी क्षत्रिय कोलिय राजवंश/कुल/वंश" का विस्तृत इतिहास/वर्णन मिलता है। एवं इनमें कोलिय कुल को भिभिन्न नामो से संबोधित किया गया है, जैसे कोलाविध्वंशी क्षत्रिय, नागवंशी, कोली, कोलिय, कुल्या, कुलिए, कौलितरं कोलीसर्प, कोलिक, कौल, शाक्य, मोर्य, चोल, चोला, मुदिराज, मुथियार, मुथुराजा, चालुक्य आदि अन्य नामों से संबोधित किया गया है। जैसे


शका यवनाकाम्बोजा: पारदाश्च विशाम्पते । कोलि सर्पा समहिषा दार्वाश्चौरा (चौला) सकरेला । १८ हरिवंश पुराण १४वाँ अध्याय।


उत दासं कौलितरं बृहत: पर्वतात् अधि आवहन इन्द्र शम्बरम् " ऋग्वेद-२/३/६.. शम्बर को ऋग्वेद के द्वित्तीय मण्डल के सूक्त १४ / १९ में कोलितर कहा है पुराणों में इसे दनु/मनु का पुत्र कहा है।


मार्कण्य पुराण के प्रथम अध्याय में क्षत्रिय कोली का वर्णन कोला विध्वंसी र्भिजित: नाम से मिलता है। इसका अर्थ है कि कोलों/कोली/कोलिय ने राजा सूरत को युद्ध में हराया था।


अन्त: शाक्ता बहिश्शैवा सभा मध्ये च वैष्णवा । नाना रूप धरा कौला विचरन्तीह महितले ||


अर्थात् भीतर से ये शक्ति यानि दुर्गा आदि के उपासक शाक्त हैं। बाह्य रूप से शिव के उपासक, सभा के मध्य में वैष्णव  हैं। अनेक रूपों में ये द्रविड लोग इस पृथ्वी पर विचरण करते हैं। बुद्ध की माता और पत्नी दौनों कोल/कोली/कोलिय कुल/वंश से थी। शाक्य शब्द का अर्थ शक्ति का उपासक कोल/कोली/कोलिय समुदाय ही है । कदाचित वाल्मीकि-रामायण कार ने ...इसी भाव से भी प्रेरित होकर .... अयोध्या काण्ड सर्ग १०९ के ३४ वें श्लोक में "चोर:" कहा है। क्योंकि बुद्ध से पूर्व चोर: शब्द चोल अथवा कोल/चोल/कोली/कोलिय  जन जाति का विशेषण था। 


दुर्गा सप्तशती में कोला/कोली विध्वंसी क्षत्रिय कहा गया है।


तस्य पालयतः सम्यक् प्रजाः पुत्रानिवौरसान् बभूवुः शत्रवो भूपाः कोलाविध्वंसिनस्तदा ॥ ५ ॥ तस्य तैरभवद् युद्धमतिप्रबलदण्डिनः न्यूनैरपि स तैर्युद्धे कोलाविविध्वंसिभिर्जितः ॥ ६ ॥


वर्तमान में क्षत्रिय कोली, कोलिय, शाक्य, मोर्य, राजपूत, राजपूत कोली, चौहान, भाटी, तंवर, मकवाना, बारिया, ठाकोर/ठाकुर, महादेव, टोकरे, मच्छीमार, इक्षवाुक, नागवंशी, सूर्यवंशी, महावर/माहौर, बिष्ट, रावत, गुसाईं, नेगी, राणा, चौधरी, आर्यन, पंवार, मुदिराज, मुथियार, चंदेल, कश्यप, सरोला, कोली पटेल, आदि सैकड़ों सरनेम/टाइटल प्रयोग करते हैं।


[नागवंशी क्षत्रिय कोलिय] सूर्यवंश एवं चन्द्रवंश की तरह ही नागवंश के प्रमाण आदि सृष्टि अर्थात् वैदिक काल के आरम्भ से मिलता है। नागवंश यक्ष, गंधर्व और देवताओं की कोटि का सुसंस्कृत वंश/कुल था। (महाभारत आदिपर्व, अध्याय 66, श्लोक 69-70)


नागवंश का सभी वेद, पुराण, रामायण, महाभारत एवं सभी प्राचीन धर्म ग्रंथो व साहित्यों में विस्तृत और गौरवशाली वर्णन मिलता है।


प्राचिन भारत नागवंश राजकुल राजाओं के अधीन रहा है। नागवंशीयों ने ही भारत का पहला नाम जम्बुद्वीप रखा था। नागवंश एक राजकुल है। और उस राजकुल के सर्प प्रजाती है, और उसी कुल के मानव यानी नाग राजा प्राचिन नागवंशी क्षत्रिय कहलाए है।


शिव नाग -( 20 ईस्वी ) शिव नाग तथा शेष नाग एक दुसरे के प्रतिक है। इस शिव नाग को पुराणों मे वासुकी नाग भी बता दिया  गया है।


शिशु नागवंश         30 ईस्वी से 543 


नागवंश पल्लव       115  ईस्वी से  300 


भारशिव वंश          143  ईस्वी से 320   


वकाटक वंश           260 ईस्वी से 550 


सुर्यवंश ,भरतवंश      350 ईस्वी 


कार्कोटकवंश           631 ईस्वी से 855


नाग वंशावलियों में 'शेष नाग' को नागों का प्रथम राजा माना जाता है। शेष नाग को ही 'अनंत' नाम से भी जाना जाता है। इसी तरह आगे चलकर शेष के बाद वासुकी हुए फिर तक्षक और पिंगला। 


वासुकी का कैलाश पर्वत के पास ही राज्य था और मान्यता है कि तक्षक ने ही तक्षकशिला (तक्षशिला) बसाकर अपने नाम से 'तक्षक' कुल चलाया था। उक्त तीनों की गाथाएं पुराणों में पाई जाती हैं। 


उनके बाद ही कर्कोटक, ऐरावत, धृतराष्ट्र, अनत, अहि, मनिभद्र, अलापत्र, कम्बल, अंशतर, धनंजय, कालिया, सौंफू, दौद्धिया, काली, तखतू, धूमल, फाहल, काना इत्यादी नाम से नागों के वंश हुआ करते थे। भारत के भिन्न-भिन्न इलाकों में इनका राज्य था।


अथर्ववेद में कुछ नागों के नामों का उल्लेख मिलता है। ये नाग हैं श्वित्र, स्वज, पृदाक, कल्माष, ग्रीव और तिरिचराजी नागों में चित कोबरा (पृश्चि), काला फणियर (करैत), घास के रंग का (उपतृण्य), पीला (ब्रम), असिता रंगरहित (अलीक), दासी, दुहित, असति, तगात, अमोक और तवस्तु आदि। 


नौ नाग राजाओं के जो प्राचीन सिक्के मिले हैं, उन पर 'बृहस्पति नाग', 'देवनाग', 'गणपति नाग' इत्यादि नाम मिलते हैं। ये नागगण विक्रम संवत 150 और 250 के बीच राज्य करते थे। प्रयाग के क़िले के भीतर स्तंभलेख है। 


नागलोक के नागराज वासुकि द्वारा सुरक्षित उनकी भोगवती नामक पुरी/राज्य था। देवराज इन्द्र की सर्वश्रेष्ठ नगरी अमरावती की तरह ही यह भी सुख-समृद्धि से सम्पन्न थी। कलयुग में इसी महान कुल में जन्मे नागवंशी काशी (वर्तमान वाराणसी) राजा के पुत्र (कोलऋषि) राजाराम और सूर्यवंशी शाक्य राजकुमारी पिया के विवाह उपरांत उनकी संतान कोली/कोलिय कहलाई। इस वंश/कुल में कई महाप्रतापी रहा हुए।


इसी वंश में महाप्रतापी काशी के नागवंशी राजा बिरसेन जिनहोने काशी के द्वाशश्मेघ घाट पर 10 अश्वमेघ यज्ञ किए थे जिसके फलस्वरूप उस घाट का नाम द्वाशासमेघ घाट पड़ा।


इसी वंश में कलयुग में महाराजा अंजन नागवंशी कोलिय कुल के महाप्रतापी राजा हुए। जिनके नाम से अंजन/कोलिय संवत की सुरुआत हुई। अंजन कोलिय संवत/संसार का सबसे पुराना कलेंडर है।  अंजन/कोलिय संवत के अनुसार वर्तमान 2020 मै 2712 साल चल रहा है।


[अंगुत्तर निकाय तथा विष्णु-पुराण के अनुसार] प्राचीन काल में सम्पूर्ण भारत में जिन सोलह महाजनपद का वर्णन मिलता है।


उसमें एक काशी नागवंशी क्षत्रियो का महाजनपद था। काशी/वाराणसी में आदिकाल से नागवंशी क्षत्रियो का ही अधिकार रहा है। काशी शिव की नगरी है, ओर नागवंशी शिव के परम भक्त/उपासक है।


दूसरा कोशल महाजनपद के सूर्यवंशी राजा प्रसेनजित के अवसान के बाद कोशल राज्य के बागडोर मगध नरेश अजातशत्रु (प्रसेनजित के भान्जे व राजा बिंबिसार के पुत्र) के हाथों चली गयी। 544 ई0 पूर्व तक यहाॅ का शासन मगध से, शिशुनाग वंशी राजा अजातशत्रु के वंशजों द्वारा चलता रहा।


हर्यक वंश नागवंश की एक उपशाखा थी। हर्यक वंश की स्थापना की स्थापना बिम्बिसार ने की थी।


तीसरा कोलिय ओर चोथा शाक्य जनपदों के विस्तृत ओर गौरवशाली इतिहास के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं।


पुराणों के अनुसार पांचवा मगध का प्रथम शासक -शिशुनाग था। लेकिन इतिहास में बिम्बिसार को ही मगध का प्रथम शासक माना गया है। इस तरह महाभारतकाल के बाद भी सम्पूर्ण भारत के अधिकतर क्षेत्र पर नागवंशी कोलिय का ही अधिकार रहा है।


प्राचीन श्रावस्ती, पुराणों तथा बौद्ध ग्रन्थों में भी इसके विषय में विस्तृत वर्णन किया गया है। 


बैस राजपुत भी नागवंशी है। इसीलिए m.a sharing ने 1872 में कोलियों को सम्मानित बैस राजपुत कहा है।


[अग्निवंशीय] राजपूतों की उत्पत्ति ऋषियों द्वारा आबू पर्वत पर किये यज्ञ के अग्निकुंड से हुई जिनकी चार शाखाएं परमार, प्रतिहार, चौहान तथा सोलंकी। अग्निवंश की उत्त्पति की भिन्न भिन्न परिभाषाएं बुद्धिजीवियों ने इतिहासिक पुस्तको व साहित्यों में दी है। अग्निवंश के विषय में अधिकतर इतिहासकारों का मत है कि जो क्षत्रिय अपने मूल क्षात्र धर्म से विरक्त होकर बौद्ध धर्म अपना लिया था अर्थात शस्त्र का त्याग कर दिया था, उन क्षत्रियों को अग्नि/हवन/मंत्रोच्चारण से दीक्षित/शुद्ध करके पुनः क्षात्र धर्म में सम्मिलित किया गया। इनमे अधिकतर क्षत्रिय कोलिय/शाक्य कुल से थे। तथागत गौतम बुद्ध एवम् बौद्ध धर्म का सबसे ज्यादा असर कोलिय/शाक्यों पर ही पड़ा था। वर्तमान में भी परमार, प्रतिहार, चौहान तथा सोलंकी टाइटल/सरनेम का प्रयोग क्षत्रिय कोलिय करते हैं।


[जैन धर्म और नागवंशी कोलिय कुल] सभी जैन तीर्थकर का अवतरण क्षत्रिय वंश/कुल में हुआ। वर्तमान से लगभग तीन हजार वर्ष पहले पौष कृष्ण एकादशी के दिन काशीराज राजा अश्वसेन और माता महारानी वामादेवी के पुत्र के रूप मै भगवान पार्श्वनाथ का अवतरण हुआ। भगवान पार्श्वनाथ जैन धर्म के तेइसवें तीर्थकर है। राजा अश्वसेन काशी के महाप्रतापी राजा नागवंशी क्षत्रिय थे। इसी राजवंश/कुल मै काशीराज के पुत्र (कोलऋषि) राजाराम का जन्म हुआ था।


[पल्लव राजवंश-एक ओर बुद्ध बोधिधर्म/बोधी धर्मन] (The another buddha bodhidharma and koliya kul) चोल राजकुमार और मणिपालवम की नाग राजकुमारी से पल्लव राजवंश की उत्पत्ति हुई। पल्लव राजवंश प्राचीन दक्षिण भारत का एक राजवंश था। चौथी शताब्दी में इन्होंने कांचीपुरम में राज्य स्थापित किया और लगभग ६०० वर्ष तमिल और तेलुगु क्षेत्र में राज्य किया। बोधिधर्म/बोधी धर्मन का जन्म इसी राजवंश में हुआ था। बोधिधर्म/बोधी धर्मन एक महान भारतीय बौद्ध भिक्षु एवं विलक्षण योगी थे। इन्होंने 520 ई. में चीन जाकर ध्यान-सम्प्रदाय (झेन बौद्ध धर्म) का प्रवर्तन/निर्माण किया ओर चीन में मार्शल आर्ट और कुंग फू जैसी विद्या को सिखाया। ये एक महान चिकित्सक भी थे। ये दक्षिण भारत के कांचीपुरम के क्षत्रिय कोली राजा सुगन्ध के तृतीय पुत्र थे।


[चोल/चोलाज/चोला/कोलिय साम्राज्य] चोल/कोलिय (तमिल - சோழர்) प्राचीन भारत का एक क्षत्रिय कोलिय/चोल राजवंश था। दक्षिण भारत में और पास के अन्य देशों/राज्यो में तमिल चोल/कोलिय शासकों ने 9 वीं शताब्दी से 13 वीं शताब्दी के बीच एक अत्यंत शक्तिशाली हिन्दू साम्राज्य का निर्माण किया। महाप्रतापी चोला/कोलिय महाराजा (Maharaja Karikala Chola/Koliya) अर्ली चोला/कोलिय थे। चोल/चोला/कोलिय राजा शिव के अनन्य उपासक थे। इसलिये उनके काल में निर्मित ज्यादातर मन्दिर शिवजी को समर्पित हैं। इन्होंने संगम काल के दौरान समस्त दक्षिण भारत में शासन किया था। उन्हें शुरुआती चोलों/कोलिय में सबसे महान माना जाता है। 


(महाराजा पेरुम विडुगू) महाराजा पेरुम विडुगू (कोलीयवंशी क्षत्रीय दक्षिण भारत) Perumbidugu Mutharaiyar ll - Tanjor State दक्षिण भारत (तमिलनाडु) के कोली (कोलिय) शासकों को चोल के नाम से जाना जाता है। चोल वंश के कोली महाराजा पेरुम विडुगू को महान शासक के रूप मेंं याद किया जाता है।


[Kuninda (Kulinda) Kingdom Of Koli Rajputs] कुणिन्द/कुलिंद/कोलिय सम्राज्य के पहले राजाओं में से एक महान राजा अमोघभूति थे, जिन्होंने यमुना और सतलुज नदियों (आज के उत्तराखंड और उत्तरी भारत में दक्षिणी हिमाचल) की पहाड़ी घाटी में शासन किया था। ग्रीक इतिहासकार टॉलेमी ने कुनिंडा के उद्गम को उस देश से जोड़ा जहाँ गंगा, यमुना, और सतलुज नदियाँ मिलती हैं। यहा एक स्तंभ पर अशोक का एक अभिलेख भी कालसी में मौजूद है, जो गढ़वाल के क्षेत्र में है, जो 4 वीं शताब्दी ईसा पूर्व से इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म के प्रसार का संकेत देता है व गढ़वाल ओर कुमाऊं के कोली राजपूत के कुलीन/कोली वंश से सम्बन्ध के निशान मिलते है। कुणिन्द/कुलिंद/कुलीन शब्द आया कोली से जिसका अर्थ है उच्च स्थिति का व्यक्ति व शक्तिशाली व्यक्ति को दर्शाता है। कुनिंडा साम्राज्य तीसरी शताब्दी के आसपास एक शक्तिशाली राज्य के रूप में स्थापित था। कुनिंडा सिक्कों की खोज अक्सर इंडो-ग्रीक सिक्कों की खोज से जुड़ी हुई है। कुनिंडा सिक्कों का एक बहुत बड़ा हिस्सा राजा अमोघभूति के नाम पर है, और ऐसा माना जाता है कि उनके नाम के तहत सिक्का उनकी मृत्यु के बाद भी जारी रहा। कुछ बाद के सिक्के हिंदू देवता शिव के प्रतीक हैं।


[मौर्य साम्राज्य] पाली भाषा के ग्रंथो एवम् बौद्ध साहित्य में शप्ष्ट रूप से शाक्यो/कोलीयो को मौर्यो का पूर्वज बताया गया है। मौर्य साम्राज्य की स्थापना चक्रवर्ती सम्राट चन्द्रुप्त मौर्य ने कि थी। (चक्रवर्ती सम्राट अशोक महान) इसी कुल के चक्रवर्ती सम्राट अशोक ने संपूर्ण भारत पर शासन किया। सम्राट अशोक को  चक्रवर्ती सम्राट अशोक "महान" के नाम से जाना जाता है। चक्रवर्ती सम्राट अशोक महान ने महामाया/गौतमी/मायादेवी (भगवान सिद्धार्थ गौतम बुद्ध की माता) का मन्दिर लुंबनी नेपाल में बनवाया। 


[महाप्रतापी राजा वीर मदकरी] दक्षिण भारत वर्तमान कर्नाटक में नागवंशी क्षत्रिय कोलिय कुल के महाप्रतापी राजा वीर मदकरी नायक ने एक शक्तिशाली राज्य की स्थापना की थी। वे अपनी न्यायप्रिय शाशन व्यवस्था के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने कई शिव मंदिरों का निर्माण भी करवाया।


[परमार वंश] मध्य प्रदेश के निमाड़ उज्जैन खंडवा क्षेत्र में आज भी मौर्य राजपूत शुद्ध मिलते हैं जिनका अन्य राजपूतो में शादी व्यवहार है। परमार वंश मौर्य वंश की ही शाखा है। मेरुतुंग ने अपने ग्रन्थ स्थिरावाली में उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य के पिता गर्दभिल्ल (गन्धर्वसेन) को मौर्य सम्राट सम्प्रति का वंशज लिखा था, सम्प्रति भी सम्राट अशोक का पौत्र था विक्रमादित्य को परमार वंशी माना जाता है इससे परमार वंश मौर्य वंश की शाखा सिद्ध होती है वस्तुतः अधिकांश मौर्य वंशी कालांतर में परमार राजपूत कहलाए।


[महान क्षत्रिय कोली मराठा एवम् मराठा साम्राज्य] महाराष्ट्र में छत्रपति शिवाजी महाराज की सेना में अधिकतर सेनापति क्षत्रिय कोली/कोलिय थे। मराठा सेना में लगभग 35% क्षत्रिय काेलियो की संख्या थी। (तानाजी मालुसरे) छत्रपति शिवाजी महाराज तानाजी मालुसरे को अपना परम मित्र मानते थे। उन्हें शेर कह कर पूकारते थे। (कान्होजी आंग्रे) कोलीय मराठा नौसेनाध्यक्ष कान्होजी आंग्रे (जन्म: अगस्त 1669, देहांत: 4 जुलाई 1729), जिन्हें 18वी सदी ई॰ में मराठा साम्राज्य की नौसेना  के सर्वप्रथम सिपहसालार थे। उन्हें सरख़ेल आंग्रे भी कहा जाता है। "सरख़ेल" का अर्थ भी नौसेनाध्यक्ष (ऐडमिरल) होता है। उन्होंने आजीवन हिन्द महासागर में ब्रिटिश, पुर्तगाली और डच नौसैनिक गतिविधियों के विरुद्ध लड़ाई लड़ी। उनके पिता तान्होजी आंग्रे भी छत्रपति शिवाजी की फ़ौज में नायक थे। (मराठा सरसेनापती सरदार येसाजी कंक) येसाजी कंक का पुरा नाम देशमुख साहेब सरनोबत सरदार येसाजी कंक था। येसाजी कंक भूटोंडे जागीर के क्षत्रिय कोली देशमुख (कोली राजा) थे। यह जागीर येसाजी कंक को छत्रपति शिवाजी महाराज ने दी थी। (क्षत्रिय कोली राजा नाग नाईक) महाराष्ट्रा के कोंढाणा किले पर 1327 इसवी मे राज करने वाले महादेव कोलिय कुल के राजा नाग नाईक थे। 


(श्री कोली राजपुत मंदिर) ये मन्दिर 1934 - 35 का बना है, ये झलकारी नगर, अलवर गेट रोड,  अजमेर, राजस्थान में स्थित है। (माता मुम्बा देवी मन्दिर मुंबई) महाराष्ट्र के मुम्बई का नाम क्षत्रिय कोली/कोलिय कुल देवी मुम्बा देवी के नाम पर रखा गया है। (माता मायादेवी मन्दिर लुंबनी, नेपाल) माया देवी मंदिर प्राचीन बुद्ध मंदिर है जो कि लुंबिनी, नेपाल, के युनेस्को विश्व धरोहर स्थल में स्थित है। इसका निर्माण चक्रवर्ती सम्राट अशोक महान ने करवाया था।


[श्री वेलनाथ बापू जी कोलिय कुल के महान संत थे।] 


[क़िस्सा-ए-संजान] (फ़ारसी: قصه سنجان, गुजराती: કિસે સનજાન/કિસ્સા-એ-સંજાણ, अंग्रेज़ी: Qissa-i-Sanjan) भारत में पारसी शरणार्थियों के आरम्भिक काल का एक समकालीन ऐतिहासिक वर्णन है। इस्लामिक आक्रमणकारियों से बचते बचाते फारसी जब भारत में शरण लेने के लिए आये तो उन्हें गुजरात के दयालु क्षत्रिय कोली राजा जैदी राणा ने इस्लामिक आक्रमणकारियों की परवाह किए बगैर उनको सरंक्षण/शरण दिया था। क़िस्सा प्राचीन ख़ुरासान में शुरु होता है और यहाँ से प्रवसियों की गुजरात की यात्रा का बखान करता है। काव्य का पहला अध्याय सबसे लम्बा है और संजान में आतिश बेहराम (पारसी अग्निमंदिर) की स्थापना के साथ समाप्त होता है। बाद के अध्यायों में ईरान पर मुस्लिम आक्रमकों के शुरुआती हमलों को सफलतापूर्वक वापस धकेल देने और फिर बाद में रक्षा करने में असफलता और फिर भारत की ओर प्रवास का ब्योरा है। इस प्रस्थान से पहले ईरान के बूशहर में 15 वर्षों तक के ठहरने का भी उल्लेख है। अंत में ईरान से पवित्र अग्नि को संजान लाने और वहाँ स्थापित करने का वर्णन है। ब्योरे की समाप्ति पर बहमान काइकोबाद नामक पारसी पुजारी के हस्ताक्षर हैं।


[उत्तराखंड में क्षत्रिय कोली राजपूत] उत्तराखंड गढ़वाल क्षेत्र में क्षत्रिय कोलियों के पौराणिक राजपूती वंशज होने के कई प्रमाण विद्यमान हैं, जैसे; 

(१) टिहरी गढ़वाल के सीमतीर्थ स्थान पर 'कुसमा कोलिण' की मूर्ति।

(२) देहरादून के रायवाला बाजार से डेढ़ किमी दूर 'कोलिया नेगी' का किला। जिसमें हाथियों को रखने का स्थान तक मौजूद हैं।

(३) पौड़ी गढ़वाल की गुजड़ू पट्टी में 'जगदेई कोलिण' की मूर्ति।

Jagdai Kolin (जगदेई कोलिण) Was A Woman From Koli Community Of Pauri Gadwal In Uttarakhand. She Saved The Life Of Peoples From Gorkha Army Sent By Rana Bahadur Shah Ruler Of Nepal Kingdom In 1804 To Annexe The Garhwal And Kumaon In Nepal. Real Name Of Jagdai Kolin Is Unknown Yet Now Nobody Know. This Name Is Given By Peoples For Her Brave Act Of Saving Lifes. Peoples Called Her As Jagdai Means जगत की देवी.

(४) पौड़ी गढ़वाल की पट्टी कोलागाड में कोली राजपूतों के थोक थे,इसलिए इस पट्टी का नाम कोलागाड रखा गया।

(५) पौड़ी गढ़वाल की बछणस्यूं पट्टी में डुंगरा गांव से अगला कोली गांव है जहां कोली राजपूतों की थोकदारी थी।

(६) पौड़ी गढ़वाल के मौन गांव के भगवती मंदिर के जागरी/पुजारी कोलीवंशी हैं, तथा बकरे की बलि आज भी मात्र कोलीवंशी ही चढ़ाते हैं और बलि चढ़ाने वाली तलवार भी कोली राजपूतों के पास रहती है।

(७) जनपद पौड़ी के इड़ियाकोट तल्ला में कोली राजपूतों के भवनों तथा गढ़ों के खण्डहर आज भी मौजूद हैं।

(८) पौड़ी गढ़वाल की डबरालस्यूं पट्टी के मशहूर 'डबोली गांव' के भूमिया मंदिर के पुजारी सदियों से कोली राजपूत हैं।

(९) पौड़ी गढ़वाल के ही कफोलस्यूं पट्टी के गहड़ गांव में कोली राजपूतों के गढ़ों के खंडहर तथा भवनों के खंडहर प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।

(१०) गढ़वाल में कोलीगढ़ क्षत्रिय कोलीयों का महत्वपूर्ण गढ़ था।

उत्तराखंड गढ़वाल में शकों (खसों) के आने से पूर्व नागों/कोलियों/नागवंशियों का एकक्षत्र राज्य था। कोली/नागों में कृष्ण की पूजा नाग के अवतार के रूप में में की जाती थी,.. सेमुमुखेम जैसे नाग मंदिर आज भी उस प्रथा के अंश हैं।


[वर्तमान ओर आज़ादी से पूर्व क्षत्रिय कोली संस्थाएं]


(गढ़वाल कोली राजपुत सभा" उत्तराखंड) माननीय स्व. श्री भगत राम वैद्य जी, रतनपुर, भाबर, उत्तराखंड "गढ़वाल कोली राजपूत सभा" के संस्थापक अध्यक्ष थे। उत्साही समाज-सेवक और राष्ट्रीय कार्यकर्ता थे। उन्होंने क्षय रोग-निवारण के लिये विशेष प्रयत्न किया।


(क्षत्रिय कोली महासभा पंजीकृत बिहार) ये सभा आज़ादी से पहले बिहार में कार्यरत थी।)


(अखिल भारतीय कोली राजपुत महासभा" अजमेर राजस्थान) 1939 में, माननीय स्व. श्री नाथु सिंह तँवर जी द्वारा स्थापित "अखिल भारतीय कोली राजपुत महासभा" ने "कोली राजपूत जाति का संक्षिप्त परिचय" प्रकाशित किया था, जो कि प्रसिद्ध आर्य समाजी श्री नंद कुमार शास्त्री द्वारा लिखा गया था। एवम माननीय स्व. श्री नाथु सिंह तँवर जी द्वारा स्थापित "कोली राजपुत" नामक मासिक पत्रिका आज़ादी से पहले और बाद में लगभग 70-80 साल तक अजमेर राजस्थान से प्रकाशित होती रही।


(श्री कोली राजपूत हितकारिणी सभा" अजमेर, राजस्थान) माननीय स्व. श्री नाथु सिंह तँवर जी द्वारा स्थापित "श्री कोली राजपूत हितकारिणी सभा" नामक कोली राजपूतो की संस्था आज़ादी 1947 से पहले अजमेर राजस्थान में कार्यरत थी। वर्तमान मै भी "श्री कोली राजपूत हितकारिणी सभा" अजमेर राजस्थान मै कार्यरत हैं।


("कोली राजपुत सभा" कानपुर, उत्तर प्रदेश) आज़ादी से पहले कोली राजपूतो की एक सामाजिक संस्था "कोली राजपुत सभा" कानपुर वर्तमान के उत्तर प्रदेश में भी कार्यरत थी।


("गढ़वाल राजपुत सभा" पंजीकृत दिल्ली) "गढ़वाल कोली राजपुत सभा" उत्तराखंड का पुनर्गठन करके 1972 मै "गढ़वाल राजपुत सभा" दिल्ली की स्थापना की गई, जो वर्तमान में भी कार्यरत हैं।


(अखिल भारतीय क्षत्रिय कोली राजपूत संघ पंजीकृत दिल्ली) इस संस्था के संस्थापक राष्ट्रीय अध्यक्ष ठाकुर विजय सिंह है। संस्था की स्थापना 2018 में की गई।


(क्षत्रिय संघ सुंदरनगर पंजीकृत हिमाचल प्रदेश) (कोली तानाजी सेना पंजीकृत गुजरात प्रदेश) (मांधाता ग्रुप पंजीकृत गुजरात प्रदेश) (अखिल भारतीय आर्यन महासभा पंजीकृत केरल प्रदेश) आदि अनेकों क्षत्रिय कोलिय संस्थाएं वर्तमान में भी कार्यरत हैं।


[आज़ादी की लड़ाई में क्षत्रिय कोलियों का योगदान]


(1828 का क्षत्रिय कोली विद्रोह) सन् 1828 मे महाराष्ट्र के क्षत्रिय कोली (Koli) जाती ने गोवींद राव खरे नाम के क्षत्रिय कोली सरदार के नेतृत्व में विद्रोह किया।


(नाना फरारी ने आजादी की लडाई लड़ी। वह महाराष्ट्र के महादेव कोली थे। नाना फरारी ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ हथियार उठाए थे।)


(नाइक हरी मकाजी और नाइक तांत्या मकाजी नाम के दो कोली भाईयों ने 1879 में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह कर हथियार उठा लिए थे।)


(पांचाकाका/पंचभाई पटेल) इन्होंने डांडी मार्च, सत्याग्रह और No-Tax Movement में हिस्सा लिया था। और ब्रिटिश सरकार ने इन्हे जेल में डाल दिया और जमीन जायदाद जब्त कर ली थी। पंचभाई पटेल भारत के गुजरात के नवसारी जिले में दांडी के पास कराडी गाँव के निवासी थे। वह गुजरात के तलपाड़ा कोली पटेल थे।


(Rooplo Kolhi) 22 अगस्त 1858 को रूप्लो कोली भारतभूमि के लिए बलिदान हो गए थे।


(राघोजी भांगरे) 13 मार्च 1848 को जब कोली क्रांतिकारी राघोजी भांगरे को थाणे जेल म फांसी लगाई जा रही थी तो पहली बार में ही फांसी के फंदे की रस्सी टुट गई थी इसके बाद दुबारा से लोहे की जंजीर से राघोजी भांगरे को 2 May 1848 को फांसी दी गई थी।


(1857 की क्रांति की वीरांगना झलकारीबाई ने रानी लक्ष्मीबाई के साथ मिलकर अंग्रेजो के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष किया था।)


(जयानन्द भारती उत्तराखंड) सामाजिक चेतना की एक और कड़ी में ‘डोला-पालकी आन्दोलन’ का श्रेय भारती को जाता है। स्वतन्त्रता संग्राम में भारती जी के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। 28 अगस्त 1930 को इन्होंने राजकीय विद्यालय जयहरीखाल की इमारत पर तिरंगा झंडा फहराकर ब्रिटिश शासन के विरोध में भाषण देकर छात्रोें को स्वतन्त्रता आन्दोलन के लिए प्रेरित किया। 30 अगस्त 1930 को लैंसडाउन न्यायालय द्वारा इन्हें तीन माह का कठोर कारावास दिया गया। धारा 144 का उल्लंघन करते हुए जब इन्होंने अंग्रेजी शासन के विरूद्ध दुगड्डा में जनसभा की तो इन्हें छः माह के कठोर कारावास की सजा हुई। जब गढ़वाल पौड़ी की शांति सभा ने उत्तर प्रदेश के गर्वनर जनरल सर मैलकम हेली को पौड़ी आमन्त्रित किया तो गढ़वाल के इस स्वाभिमानी सपूत का खून खौल उठा। मैलकम हेली जैसे ही स्वागत भाषण के लिये उठा उसी समय भारती जी बड़ी शीघ्रता से मंच पर चढ़कर ”गो बैक मैलकम हेली, भारत माता की जय” के नारे लगाने लगे। लाठियों से लगातार पीटते हुए उनके मुंह में रूमाल ठूंस कर ऊपर दरी डाल दी गयी और हथकड़ी पहनाकर उन्हें एक वर्ष के कठोर कारावास में डाल दिया गया। भारती जी का यह अदम्य साहस ‘ऐतिहासिक पौड़ी कांड’ के नाम से प्रसिद्ध है जो जनपद के मुख्यालय के गजट में भी अंकित है। में गर्व के साथ कहना चाहता हूं, जयानन्द भारती जी मेरे नाना ससुर थे।


ऐसे हजारों लाखो कोलियो ने देश को स्वतंत्र कराने के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया।


आज़ादी 1947 तक क्षत्रिय कोलियो की ऑन रिकॉर्ड लगभग 65-70 रियासतें थी। एक अनुमान के अनुसार इतिहासकार व बुद्धिजीवी इसकी संख्या 200 के आसपास मानते हैं। क्योंकि क्षत्रिय कोलिय/शाक्य कुल के भिभिन्न राजवंश 1947 तक भिन्न भिन्न नामों से जाने जाने लगे, ओर उनके मूल कुल की पहचान उनकी वर्तमान पहचान के नीचे दब कर रह गई।


वर्तमान के सभी क्षत्रिय कोलिय इसी कुल/वंश/समुदाय से संबन्ध रखते हैं।


Edited by (Thakur Vijay Singh Ji)

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