कत्यूरी सम्राट राजा बिरमदेव (ब्रह्मदेव):
जै बिरमाज्यू को आल बांको ढाल बांकों
तसरी कमाण बांको जीरो सेरा बांकों
नवाण को सेरा बांकों
दखणपुर बांकी लखनपुर बांकी
आसण बांको सिंहासन बांकों
सेज की कटेहेरिया राणी बांकी
खोली को भीखा पहरी बांकों
गोदी को खिलान सात ललियां बांकी
राजा बिरमा लखणपुर में बैठनी
लली, नारिंगी , सारिंगी , पूतना, रौतेली
कासाणी, दूधकेला सात ललियां बांकी
जै बिरमा को घट बौया छीं
जतिया मारखुली छी, कुकरा खदुवा छी
उल्ट नाई ले लिनी पैंचा, सुल्ट नाई ले दिनी
सात खौवा बतौनीं चालनैल चाई लिनी
माल मली, सौकाण तली की दसौत उंघूंनी
गरम पाखी, चासिंगिया लाखा, भोटियालू कामला लिनीं
अचारी करनी बिबी ढकूंनी
तरुणी तिरिया हिटन नि दिनीं डोली में भेजनी
बरड़ो बाकरो लै चरन दिनीं उकणी नीं खाणी
हिन्दी भावार्थ:
कत्यूरी राज्य बहुत समृद्ध था और उन पर परमात्मा की बहुत कृपा थी जिससे की उनकी भौतिक वस्तुएं भी जीवंत की तरह कार्य करती थी राजा बिरमा का आल (राज्य), ढाल कमान रखे तीर बाण, खेत खलिहान, दखणपुर ( वर्तमान ढिकुली / गर्जिया), लखनपुर राजधानियां, सिंहासन, उनकी अति गौरवी कटेहरिया महारानी (जो कटेहर के चौहान वंश, जो काशी नरेश के वंशज थे, की राजकुमारी व राजा बिरमा या बिरमदेव की महारानी थी), राजमहल के पहरी (सुरक्षाधिकारी) भीखा, गोदी में खेली सात कन्याएं लली, नारिंगी, सारिंगी, पूतना, रौतेली, कासाणी, दूधकेली बहुत बलवान व शक्तिशाली और सभी स्वयं उर्जावान व क्रिया शील थी (यही सात कन्याएं चन्द राजा से, राजा बिरमदेव व समुचित सेना की अनुपस्थित में लड़ी थी और कत्यूरी साम्राज्य के लिए अपने जीवन की आहुति दी थी इसी कारण पहले कत्यूर वंशीय भय्या दूज का त्योहार नहीं बनाते थे वर्तमान में धीरे धीरे लोग अब मना रहे हैं लेकिन सभी कत्यूरी वंशजों को इन सात बहिनों के बलिदान को अवश्य याद करना चाहिए) राजा बिरमदेव देव ने जनता के लिए पनचक्कियां लगाई थी जिन पर कार्यरतों के लिए कुछ भाग (शुल्क) लिया जाता था उनका भैंसा भी मारने वाला था अर्थात आवश्यकतानुसार उसकी भी सेवा ली जा सकती थी इसी प्रकार उनके कुत्ते (कुकुर) भी खदुवा (काटने) वाले थे समय पर उनसे भी सुरक्षा के कार्य लिये जाते थे वे उल्टी नाली से यदि पैंच लेते थे तो उसको सीधी नाली से लौटाने का प्रयास करते थे अनाज को शुद्ध व साफ भोजन के रुप में प्रयोग करते थे वे सात खौवा (अनाज निकालने व भूसा उड़ाने के घेरे) में साफ करते थे (आज भी कई गांवो में दसियों खौवे हैं और आटे आदि को कपड़े से छान कर प्रयोग करते थे (उस समय छलनी नहीं हुआ करती थी) वे अपनी जनता को भी ऐसा ही करने की शिक्षा देते थे जिससे वे स्वस्थ व बलवान होंवें कत्यूरी साम्राज्य आज से करीब हजार वर्ष पूर्व भी इतनी स्वच्छता रखने का प्रयास करता था वे माल (वर्तमान भाभर अर्थात रामपुर पीलीभीत बरेली से ऊपर को और सौकाण से नीचे अर्थात वर्तमान तिब्बत से नीचे में दसौत (राज्य कर) वसूलते थे गरम भोजन का सेवन करते थे चौसिंगिया खस्सी बकरे को आहार में लेते थे जो बांझ बकरी को मारने नहीं देते थे उसको भी स्वतंत्र रहने देते थे भोटियों से दसौत में कम्बल लेते थे बहुत आचार बिहार करते थे औरतों को सिर ढक कर रखना पड़ता था तरुणी तिरिया (जवान युवती) को पैदल नहीं चलने देते थे उनके प्रति आदर भाव था और उनको डोली में ले जाने के लिए कहते थे जिससे उनका यौवन गरिमामय हो और वे सुरक्षित रहें यह कत्यूर राजाओं का कुछ संक्षिप्त इतिहास है आप सभी भी हम सभी भी अपने जीवन को ऐसा ही बनाने का प्रयास कर अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि अर्पित करें कत्यूरी राजाओं के प्रति भ्रांतियां फैलाने वालों का भरपूर विरोध करे और समुचित उत्तर भी दें।
जय जिया 🌹🙏🏻
जय कत्यूर वंश 🌹🙏
परिपूर्ण वात्सायन मनराल
ग्राम व पत्रालय: सैणमानूर
तहसील: भिक्यासैण; जिला: अल्मोड़ा
उत्तराखंड
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