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कत्यूरी पाल वंश के वंशज

 उत्तराखंड की हिमालयी चोटियों से लेकर उत्तर प्रदेश के मैदानी क्षेत्रों तक फैला कत्यूरी राजवंश भारतीय सभ्यता की एक अमूल्य धरोहर है। यह राजवंश, जो लगभग 2500 वर्ष पूर्व से 700 ईस्वी तक सिक्किम से काबुल तक अपने विशाल साम्राज्य का परचम लहराता रहा, अपनी सैन्य शक्ति, प्रशासनिक कुशलता, और सांस्कृतिक योगदान के लिए प्रसिद्ध है। ऐतिहासिक दस्तावेजों, ताम्रपत्रों, और वंशावलियों के आधार पर यह लेख कत्यूरी वंश की गौरवशाली गाथा को प्रस्तुत करता है, जिसमें महुली, हरिहरपुर, अस्कोट, और अन्य शाखाओं का विशेष उल्लेख है। मैं, अखिलेश बहादुर पाल, महसों-हरिहरपुर इस्टेट से, अपने पूर्वजों की इस महान विरासत को आपके सामने ला रहा हूँ।

कत्यूरी राजवंश की उत्पत्ति प्राचीन भारत के सूर्यवंशी क्षत्रियों से मानी जाती है। इतिहासकारों के अनुसार, इस वंश की नींव सम्राट शालिवाहन ने लगभग 3000 वर्ष पूर्व अयोध्या से रखी थी। उनकी प्रारंभिक राजधानी जोशीमठ के निकट थी, जो बाद में कार्तिकेयपुर स्थानांतरित हुई। उस समय उनका साम्राज्य सिक्किम से काबुल तक, जिसमें दिल्ली, रोहिलखंड, और अन्य प्रांत शामिल थे, विस्तृत था। इतिहासकार अलेक्जेंडर कनिंघम ने अपनी पुस्तक में इस विशाल साम्राज्य का उल्लेख किया है।


महाभारत में कत्यूरी क्षेत्र का उल्लेख मिलता है, जहां युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के दौरान उनके भाइयों—भीम, अर्जुन, नकुल, और सहदेव—ने इस क्षेत्र के क्षत्रियों से युद्ध कर नजराना प्राप्त किया। फारसी इतिहासकार फरिश्ता के अनुसार, कुमाऊँ के राजा पुरु ने दिल्ली पर चढ़ाई कर राजा दिल्लू को हराया और उसे रोहतास किले में बंदी बनाया। कनिंघम के अनुसार, कत्यूरी की राजधानी लखनपुर या ब्रह्मपुर थी, जो रामगंगा नदी के किनारे स्थित थी।


7वीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपनी यात्रा में ब्रह्मपुर और लखनपुर का वर्णन किया, जहां बौद्ध और सनातनी समुदाय सह-अस्तित्व में थे। कत्यूरी शासकों ने अपनी राजधानी जोशीमठ से कार्तिकेयपुर स्थानांतरित की। ह्वेनसांग के अनुसार, गोविषाण (वर्तमान काशीपुर) और ब्रह्मपुर में बौद्ध धर्म का प्रचार था। हालांकि, 8वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य के धार्मिक दिग्विजय ने बौद्ध धर्म के प्रभाव को कम कर सनातन धर्म का पुनरुत्थान किया। शंकराचार्य ने बद्रीनारायण, केदारनाथ, और जागेश्वर मंदिरों में दक्षिण भारत से सनातनी पंडितों को नियुक्त किया।


जोशीमठ का वासुदेव मंदिर, जिसे कत्यूरी सम्राट वासुदेव ने बनवाया, इस वंश की प्राचीनता का प्रमाण है। मंदिर में सम्राट का नाम “श्री वासुदेव गिरिराज चक्र चूड़ामणि” अंकित है, जो उनकी शाही उपाधि को दर्शाता है।


कत्यूरी साम्राज्य का विखंडन

कत्यूरी साम्राज्य अपने चरम पर सिक्किम से काबुल और दक्षिण में बिजनौर, दिल्ली, रोहिलखंड तक फैला था। लेकिन पारिवारिक विवादों और बाहरी आक्रमणों के कारण इसका विखंडन हुआ। इस वंश की शाखाएँ विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित हुईं:


अस्कोट (पिथौरागढ़): ब्रह्मदेव के पौत्र अभय पाल ने स्थापित किया।

दोती (नेपाल): कत्यूरी पाल दोती रैंका शाखा।

सुई (काली कुमाऊँ): ब्रह्मदेव की शाखा, जिसके नाम पर ब्रह्मदेव मंडी पड़ा।

बारामंडल, बैजनाथ, द्वाराहाट, और लखनपुर: विभिन्न कत्यूरी घरानों ने यहाँ अपनी संप्रभुता बनाए रखी।

सल्यान और गजोल (नेपाल): निरंजन देव के पुत्र रितु मल देव और उनके वंशजों ने शासन किया।

महुली और हरिहरपुर का उदय

1305 ई. में कुमाऊँ के अस्कोट राजवंश के दो राजकुमार, अलख देव और तिलक देव, एक बड़ी सूर्यवंशी सेना के साथ बस्ती जनपद के महुली आए। अलख देव ने महुली में अपना राज्य स्थापित कर एक दुर्ग बनवाया, जबकि तिलक देव अस्कोट लौट गए। महुली के साथ-साथ अमोढ़ा भी सूर्यवंशी शाखा के रूप में विकसित हुआ, जहां तिलक देव के वंशज कान्हदेव ने कायस्थ जमींदारों को पराजित कर शासन स्थापित किया।


महुली के प्रमुख शासक:

महाराजा अलख देव (1305-1342): महुली के संस्थापक।

राजा तपतेजपाल (1342-1359): दिल्ली सुल्तान फिरोज शाह तुगलक के बंगाल अभियान में सहयोग के बदले ‘राजा’ और ‘पाल’ उपनाम प्राप्त किया।

राजा खान पाल उर्फ ज्ञान पाल (1359-1372)।

राजा कुँवर पाल (1372-1404)।

राजा तेजपाल (1404-1421)।

राजा सततपाल (1421-1441)।

राजा मानपाल (1441-1480): उनके तीन पुत्रों—परशुराम पाल (महसों), जगतबली पाल (जसवल), और संसार पाल (सिकतार)—में राज्य विभाजित हुआ।

राजा परशुराम पाल (1480-1535)।

राजा दीप पाल (1535-1585): उनके दो पुत्र—मर्दन पाल (महसों) और करण पाल (हरिहरपुर)।1607 ई. में उत्तराधिकार विवाद के कारण महुली का विभाजन हुआ। मर्दन पाल को महसों और राजा की उपाधि मिली, जबकि करण पाल को 75 गांवों वाला स्वतंत्र हरिहरपुर राज्य और ‘कुँवर’ व ‘बाबू’ की उपाधियाँ प्राप्त हुईं। 1609 में हरिहरपुर को पूर्ण स्वतंत्र राज्य का दर्जा मिला, जो बाद में 12 कोटों (बेलदुहा, बेलवन, सींकरी, मैनसिर, भक्ता, कोहना आदि) में बँट गया।


हरिहरपुर की वंशावली

हरिहरपुर की स्थापना कुंवर करण पाल देव ने की। उनके वंशजों में प्रमुख नाम:


कुंवर राय कन्हैया बक्स पाल बहादुर: उनके तीन पुत्र—जगत बहादुर पाल, शक्त बहादुर पाल (1857 की क्रांति में शहीद), और नरेंद्र बहादुर पाल।

जगत बहादुर पाल: उनके पुत्र दान बहादुर पाल का विवाह प्रतापगढ़ (बेला स्टेट) से हुआ, जहाँ दहेज में सगरा सुंदरपुर रियासत मिली।

दान बहादुर पाल के वंशज: उनके कोई पुत्र नहीं थे, उनके भाइयों के वंशज—महादेव पाल, हरिहर प्रसाद पाल, भागवत पाल, और बांके पाल।

हरिहर प्रसाद पाल: उनके पुत्र—ज्ञान बहादुर पाल, शीतला बक्स पाल, और चंद्रिका प्रसाद पाल।

ज्ञान बहादुर पाल: उनके पुत्र गजपति प्रसाद पाल, जिनके पुत्र—गगनेंद्र पाल, गर्वमर्दन पाल, योगेंद्र पाल, और धीरेंद्र पाल।

चंद्रिका प्रसाद पाल: उनके पुत्र—राजेंद्र बहादुर पाल (वर्तमान में सक्रिय) और वीरेंद्र बहादुर पाल।

राजेंद्र बहादुर पाल के पुत्र: रवि उदय पाल, अखिलेश बहादुर पाल (लेखक), और अखंड बहादुर पाल।

अन्य शाखाएँ: मैनसिर-सीकरी में रामशंकर पाल, पन्ना पाल; भक्ता-कोहना में भद्रसेन पाल, इंद्रसेन पाल, रंग नारायण पाल (ब्रज भाषा के कवि), सत्यशरण पाल, बृजेश पाल, अदित पाल, गिरजेश पाल, बिमल पाल, विजय पाल, विनय पाल, और राजू पाल।

महसों-महुली के अंतिम राजा काशीनाथ बहादुर पाल थे, जिनके पौत्र कुंवर अंशुमान पाल वर्तमान में राज परिवार में सक्रिय हैं। बाद में बनपुर, अहरा, भितहा, और बुडावल जैसे राज्य गुजारेदारी जमींदारी में परिवर्तित हो गए। हरिहरपुर में राजा की उपाधि नहीं थी; यहाँ प्रशासन कत्यूरी परंपरा के अनुसार कमेटी आधारित था, जिसमें वरिष्ठतम व्यक्ति को अध्यक्ष बनाया जाता था। वर्तमान में कुंवर राजेंद्र बहादुर पाल हरिहरपुर के सबसे वरिष्ठ पाल वंशज हैं।


राजा मानपाल (1674-1710): महसों के तेरहवें राजा मानपाल का जन्म 1641 में और मृत्यु 1710 में हुई। उनके द्वितीय पुत्र लाल जोरावर पाल ने बनपुर में 70 गांव, महुली पश्चिम में रु. 8827 मालगुजारी वाली संपत्ति प्राप्त की, जो पहले राय कन्हैया बक्स पाल बहादुर के पास थी।


अस्कोट शाखा: सूर्यवंशी पाल वंश

1279 ई. में महाराज त्रिलोकपाल देव ने अपने छोटे पुत्र अभय पाल को अस्कोट भेजा, जहाँ उन्होंने पाल सूर्यवंशी स्टेट की स्थापना की। अभय पाल ने ‘देव’ उपनाम हटाकर ‘पाल’ अपनाया, जो उनके वंशज आज भी उपयोग करते हैं। उनके तीन पुत्र—निर्भय पाल, अलख देव, और तिलक देव—थे। अलख देव और तिलक देव 1305 में महुली आए और वहाँ राज्य स्थापित किया। अस्कोट में निर्भय पाल के वंशज आज भी निवास करते हैं, जिनमें डॉ. महेंद्र पाल, उनके भाई जंग बहादुर पाल, अधिवक्ता बहादुर पाल, और गजेंद्र पाल शामिल हैं।


हाल ही में अस्कोट के राजा भानु पाल की पुत्री गायत्री की शादी जोधपुर के महाराज गज सिंह के पुत्र शिवराज सिंह से हुई। अन्य वैवाहिक संबंधों में गजराज सिंह की पत्नी किरन सिंह (कश्मीर के राजा कर्ण सिंह की बहन) और डॉ. पाल की पत्नी मीनू (लखीमपुर खीरी के संघाई स्टेट) शामिल हैं। वर्तमान में अस्कोट के 108वें राजा भानुराज सिंह पाल हैं।


कत्यूरी वंश का सांस्कृतिक और सामाजिक योगदान

कत्यूरी वंश ने शासन के साथ-साथ संस्कृति और धर्म में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस वंश के शासक भगवान शिव और विष्णु के उपासक थे। जोशीमठ का वासुदेव मंदिर, ताम्रपत्रों और अभिलेखों में उल्लिखित अन्य मंदिर, और विभिन्न धार्मिक स्थल इस वंश की धार्मिक निष्ठा को दर्शाते हैं। कत्यूरी शासन में द्वैध शासन प्रणाली थी, जिसमें सैन्य और प्रशासनिक शक्तियाँ संतुलित थीं। 1857 की क्रांति में पाल सूर्यवंशियों की भूमिका उल्लेखनीय थी। उत्तर प्रदेश में इन्हें क्षत्रियों में सर्वोच्च वर्ण माना जाता है।


वर्तमान संदर्भ और चुनौतियाँ

आज कत्यूरी पाल वंश के वंशज उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, और नेपाल में फैले हुए हैं, लेकिन वे अपनी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित रखे हुए हैं। महसों में अमिताभ पाल, हरिहरपुर में कुंवर राजेंद्र बहादुर पाल, और अस्कोट में भानुराज सिंह पाल इस वंश की परंपराओं को जीवित रखे हुए हैं। यद्यपि कत्यूरी साम्राज्य का विस्तार अफगानिस्तान से तिब्बत तक बताया जाता है, लेकिन साक्ष्यों और शोध के अभाव में इसका पूर्ण अध्ययन अभी बाकी है। वंश के लोग ‘पाल’, ‘देव’, ‘मल्ल’, ‘शाह’, और ‘शाही’ जैसे उपनामों का उपयोग करते हैं और पूरे भारत में फैले हैं।


यह लेख कत्यूरी पाल वंश की गौरवशाली गाथा को सामने लाता है और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने की प्रेरणा देता है। यदि आप इस वंश से संबंधित हैं या अधिक जानना चाहते हैं, तो हिमालयन गजेटियर, ताम्रपत्र, और स्थानीय अभिलेखागार आपके लिए उपयोगी होंगे।

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