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कन्तित-कीर्ति-कौमुदी सम्मान

 कन्तित-कीर्ति-कौमुदी सम्मान


'कन्तित' स्थानवाचक संज्ञा है। यह एक प्राचीन हिन्दू तीर्थ और अनेक राजवंशों की राजधानी रहा है। पुराणों में कन्तित का उल्लेख 'कान्तिपुरी' के रूप में किया गया है। भारतीय इतिहास का एक ऐसा भी अध्याय है, जहाँ भारत की राजधानी कान्तिपुरी, अर्थात् कन्तित में स्थापित होती है। वह समय है यशस्वी मौर्य-शुंग-कण्व सम्राटों के बाद का, जिसे 'भारशिव-विन्ध्यक काल' (257-82 B.C.E.) कहते हैं। कन्तित को अपनी राजधानी भारशिव-नरेशों ने बनाया। भारशिव-शासक होशंगाबाद और जबलपुर के आरण्यक प्रान्त से निकलकर बघेलखण्ड होते हुए गंगा तक पहुँचे थे। सुप्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. काशीप्रसाद जायसवाल लिखते हैं– 'बघेलखण्डवाली सड़क से जो यात्री गंगा की ओर चलते हैं, वे कन्तित के उस पुराने क़िले के पास आकर पहुँचते हैं, जो मिर्ज़ापुर और विन्ध्याचल के क़स्बों के बीच में है। जान पड़ता है कि यह कन्तित वही है, जिसे विष्णु की कान्तिपुरी कहा गया है। इस क़िले के पत्थर के खम्भे के एक टुकड़े पर मैंने एक बार आधुनिक देवनागरी में 'कान्ति' लिखा हुआ देखा था। यह गंगा के किनारे एक बहुत बड़ा और प्रायः एक मील लम्बा मिट्टी का क़िला है, जिसमें एक बड़ी सीढ़ीनुमा दीवार है और जिसमें कई जगह गुप्तकाल की बनी पत्थर की मूर्तियाँ या उनके टुकड़े आदि पाये जाते हैं। यह क़िला आजकल कन्तित के राजाओं की ज़मींदारी में है, जो कन्नौज और बनारस के गाहड़वाल राजाओं के वंशज हैं। मुसलमानों के समय यह क़िला नष्ट कर दिया गया था और तब यहाँ के राजा उठकर पास की पहाड़ियों के विजयपुर और माण्डा नामक स्थानों में चले गये थे, जहाँ अबतक दो शाखाएँ रहती हैं। कन्तित के लोग कहा करते हैं कि गहरवारों से पहले यह क़िला भर राजाओं का था। ऐसा जान पड़ता है कि यह भर शब्द उसी भारशिव शब्द का अपभ्रंश है।' (अन्धकारयुगीन भारत, नागरीप्रचारिणी सभा काशी, द्वितीय संस्करण 2014 वि.सं., पृ. 9)। 


पुराणों में भारशिव नाग राजाओं की तीन राजधानियों का उल्लेख मिलता है। विष्णुपुराण में कहा गया है–

नवनागा पद्मावत्यां कान्तिपुर्यां मथुरायाम्।

पुराणोत्तरकालीन महाकाव्यों में कन्तित या कान्तिपुरी का उल्लेख श्रीकर्णतीर्थ के रूप में किया गया है। महाकवि माधव उरुव्य द्वारा 1556 ई. के पूर्व रचित 'वीरभानूदयकाव्य' में कन्तित को श्रीकर्णतीर्थ कहा गया है–

येनार्जुनेनाप्तवतीयमुर्वी श्रीकर्णतीर्थस्य नितान्तशोभाम्।

पार्थार्जुनेनेव विशालविन्ध्य प्रभावयुक्तस्य शिवालयस्य।।

– वीरभानूदयकाव्यम् 1/53


कालान्तर में चन्देल-शासक कीर्तिवर्म्मा (1060-1100 ई.) के सहयोग से श्रीकर्णतीर्थ कान्तिपुरी कन्तित की कीर्ति-कौमुदी काशी-कन्नौज के गहरवार-नरेशों से सम्पृक्त हो गयी। महाराज यशोविग्रह की सातवीं पीढ़ी के यशस्वी वंशज महाराज जयचन्द्र के अनुज महाराज माणिक्यचन्द्र उपाख्य रत्नभानु (1170-1190 ई.) ने मानिकपुर, केरामँगरौर, कन्तित-विजयपुर, माण्डा-डैया पर आधिपत्य स्थापित कर लिया। बाद में यह समस्त भूभाग माणिक्यचन्द्र के वंशजों के अधीन रहा आया। जिस कालखण्ड में महाराज माणिक्यचन्द्र ने कन्नौज से पृथक् अपना राज्य स्थापित किया, उसी कालखण्ड में कालिंजर के चन्देल साम्राज्य की चन्देरी शाखा के राजकुमार भारमलदेव अगोरी के बालन्दवंशी महावृद्ध शासक मदनशाह को अपदस्थ कर 1175 ई. में अगोरी के राजसिंहासन पर आसीन हुए।


महाराज भारमलदेव के कनिष्ठ पुत्र महाराज हरशाह (हरवर्म्म) के चार पुत्र थे– महाराज सिंहहरवर्म्म, राजकुमार हरिहरवर्म्म, राजकुमार संसारवर्म्म (संसारब्रह्म) एवं राजकुमार रुद्रशाह। महाराज सिंहहरवर्म्म के राजत्वकाल में बालन्द-नरेश मदनशाह के वृद्धप्रपौत्र बालन्द फातमशाह और खरवार हंगड़ शाह ने रात्रिकाल में अकस्मात आक्रमण कर लिया। चन्देलों का बालन्द-खरवार संघ से घमासान युद्ध हुआ। युद्ध में महाराज सिंहहरवर्म्म के अनुज रुद्र शाह भाग निकले। उनके पास ही राजकुमार संसारब्रह्म की पुत्री राजकुमारी चारुदेष्णि कुँवरि थीं। इस भीषण संग्राम में सम्पूर्ण चन्देल परिवार नष्ट हो गया। किसी तरह सहचरियों के साथ लुक-छिपकर राजकुमार संसारब्रह्म की गर्भिणी रानी भागने में सफल हुईं। मार्ग में ही रानी के गर्भ से एक सुन्दर पुत्र-रत्न का जन्म हुआ। प्रसव की असह्य वेदन से उसी समय रानी ने परलोक-यात्रा प्रारम्भ कर दी। रानी की एक परिचारिका बालक को बाँस-पात्र (ओड़ा) में रखकर भागी और मिर्ज़ापुर ज़िले में एक छोटी-सी अन्तःसलिला के तट पर अवस्थित पहाड़ा स्टेशन से एक मील पूर्व की ओर विद्यमान बेलवन गाँव, परगना कन्तित में एक सोइरी के घर में रहकर उस बालक का लालन-पालन करने लगी। बालक का नाम उड़नदेव रखा। कालान्तर में केरामँगरौर-कन्तित के 5वें शासक महाराज भरतदेव (1248-1268 ई.) की दृष्टि उड़नदेव पर पड़ी। उन्होंने उड़नदेव का लालन-पालन करनेवाली उनकी धायमाता से वास्तविक जानकारी प्राप्तकर राजकुमार उड़नदेव के सम्मान अपने राजमहल में बुलवाया और अपनी पुत्री से उनका विवाह करवाया। गहरवार-नरेश महाराज भरतदेव, काका रुद्रशाह (बिजौरा) और कतिपय ब्राह्मणों की सहायता से 1253 ई. में अगोरी, 1256 ई. में विजयगढ़ और 1261 ई. में बरदी-शाहपुर पर अधिकार कर राजकुमार उड़नदेव स्वतन्त्र शासक बन बैठे।


इस घटना का उल्लेख अपने संस्कृत-काव्य 'संक्षिप्तागोरीबड़हरपरिचयश्चन्द्रान्वयपरिचयश्च' में पण्डित रमानाथ जी ने इस प्रकार किया है–

वभूव विजितं दुर्गं राज्ञो मृत्युश्च दुस्सहः।

भाग्याद्विनिर्गता राज्ञी दुर्गाच्छसु समन्विता।।

निधायतंशिशु पात्रे वंशद्वारा विनिर्मिते।

निनाय स्वपितुर्गेहं दक्षैका कर्मकारिणी।।

तस्यपात्रस्य भाषायांमोड़ा नामप्रतिष्ठितम्।

ओड्न्देवस्ततोनाम पात्रान्नयनाकारणात् तच्छिशोः।।

विजयाद्येपुरेनाम्नि राज्ये वेलवनाभिधः।

ग्रामस्तत्र युवाजातस्तेनभिन्नश्चशैशवः।।

कन्तितस्य नृपः श्रुत्वौणनदेवस्य वृत्तकम्।

उद्वाहं कृतवान् पुत्र्यासाकं विधिविधानतः।।

राजाकन्तितराज्यस्य दत्वास्वीयंबलमहत्। 

आक्रान्त्यैप्रेषयामासधीरोऽगोरीसुपत्तने।।

विजितः पत्तनं तेन बलिना तत्पुनः खलु।

झामः पलायितस्तस्मदुर्गाद्राजा ततोऽभवत्।।

– रजत-जयन्ती-भूषण, पृ. 100-101


इस घटना का विस्तृत वर्णन इलिएट एम. हेनरी, रेवरेण्ड एम.ए. शेरिंग, डीएल ड्रैक-ब्रोकमैन आदि पाश्चात्य इतिहासकारों ने भी किया है। रेवरेण्ड एम.ए. शेरिंग ने लिखा है– 'One Ranee who was far gone in pregnancy, made her escape into the territory of Kantit (now one of the Pargannahas of the Mirzapur district) with a single female attendant. On the road the Ranee was delivered of a male child; and died soon after giving him birth. The nurse took the child, and placing it in a tray (oran), pursued her road until she came to the house of a Seori (one of the aboriginal races) Zamindar (or landowner), a man of great consideration, where she sought and obtained refuge. The child was brought up in the zamindar's family, and was named oran, to commemorate the incident of his having placed in a tray (oran) after his birth.' – M.A. Sherring : Hindu Tribes And Castes as Represented in Benares, First Edition 1872 A.D., P. 384.


वस्तुतः काशी में भगवान् विश्वेश्वर विश्वनाथ को साक्षी मानकर चन्देल-नरेश महाराज कीर्तिवर्म्मा (1060-1100 ई.) और गहरवार-नरेश चन्द्रदेव (1085-1100 ई.) के मध्य जो मैत्री हुई, कालान्तर में गहरवार-नरेश महाराज भरतदेव (1248-11268 ई.) ने राजकुमार उड़नदेव से अपनी पुत्री का विवाह करने के साथ उनकी सैन्य सहायता करके उसी का प्रत्युपकार किया।


अगोरी-बड़हर, विजयगढ़, बरदी-शाहपुर के चन्देलों और कन्तित-विजयपुर, माण्डा-डैया, कोहड़ार-बड़ोखर आदि गहरवारों के मध्य यह प्रथम ज्ञात वैवाहिक सम्बन्ध है। इसी वैवाहिक सम्बन्ध की मधुर स्मृति को जीवन्त करते हुए पण्डित रमानाथ जी ने परिहास-पेशलता का परिचय देते हुए लिखा है–

नगवरस्य हि विन्ध्यगिरेरयम्    

      शिखरभाग गतः परिशोभते।

बड़हरस्य च वायुदिशाभवं

      विजयपूर्वपुरं समवस्थितम्।।

विजयपूर्वपुरस्यपुराङ्गना

   विजितवत्यविवेकि मनः श्रुतम्।

बड़हरस्य विवेकिभिराहृता

        बड़हरत्वमिदं प्रथितं तत:।।

 – पण्डित रमानाथ जी : संक्षिप्तागोरी-बड़हरपरिचयश्च-चन्द्रान्वयपरिचयश्च : रजत-जयन्ती-भूषण (सं. पं. चन्द्रशेखर शुक्ल), पृ. 94, श्लोक सं. 7–8


बड़हर-राज्य की वायव्य (पश्चिमोत्तर) दिशा में श्रेष्ठ पर्वत विन्ध्य के शीर्षभाग पर विजयपुर नामक राज्य अवस्थित है। कहा जाता है कि विजयपुर की सुन्दरियाँ अविवेकी अर्थात् चंचल मनवाले युवकों का मन बरबस जीत लिया करती थीं, किन्तु बड़हर के विवेकी एवं मनस्वी पुरुषों के द्वारा वे अपहृत कर ली गयीं (उनका मन जीत लिया गया) उसी समय से इस स्थान का नाम बड़हर प्रसिद्ध हो गया।

वर्ष 2000 ई. में पण्डित रमानाथ जी के उपर्युक्त द्रुतविलम्बित छन्द का मैंने घनाक्षरी छन्द में छायानुवाद किया था, जो यहाँ यथावत् प्रस्तुत है–

लोल लोल लोचनों से दामिनी प्रवार कर,

                    अंगना अनंग रंग डूब बलखाती हैं।

बार बार जाता अविवेकियों का हार मन,

                मूल में विजय की सुशोभा दरसाती हैं।

गोरी को अगोरी में, बदलता कुमार सदा,

             कन्तित-किशोरी स्नेहसिक्त शरमाती हैं।

बड़हर महिमा बढ़ी हुई अनन्त आज,

            भाव-वीचियों में स्वर्ण-छवि लहराती हैं।।


इस वैवाहिक सम्बन्ध ने विन्ध्यक्षेत्र में चन्देलों और गहरवारों की पारिवारिक मैत्री की अविच्छिन्नता का बीजारोपण किया। इसके बाद दोनों तरफ़ से यह सम्बन्ध आजतक यथावत् हैं। गहरवार-परिवार की कुमारियाँ चन्देलकुमारों से और चन्देल-परिवार की कुमारियाँ गहरवारकुमारों से परस्पर ब्याही जाने लगीं। यह वैवाहिक सम्बन्ध आज भी चन्देल-गहरवार-मैत्री का प्रमुख आधार है। 


महाराज माणिक्यचन्द्र के 17वें उत्तराधिकारी महाराज गूदनदेव उपाख्य कुन्दनदेव (1483-1503 ई.) ने स्थायी रूप से कन्तित में अपनी राजधानी का निर्माण करवाया। इस दृष्टि से महाराज गूदनदेव कन्तित-विजयपुर के गहरवार-राज्य के संस्थापक हैं। यद्यपि यह क्षेत्र उनके पूर्वजों के ही अधिकार में था और वे कन्तित-नरेश ही कहे भी जाते थे, किन्तु तब राजधानी केरामँगरौर में थी। महाराज गूदनदेव की 12वीं पीढ़ी के उत्तराधिकारी राजा युवराज सिंह (1701-1721 ई.) के पुत्र राजा अनूप सिंह (1721-1741 ई.) ने अपने युवराजत्वकाल में गिरिजापुर नगर की स्थापना की, जिसे आज एक विशेष षडयन्त्र के तहत मिर्ज़ापुर कहा जाता है। इन्हीं राजा युवराज सिंह की पुत्री और राजा अनूप सिंह की बहन राजकुमारी कनक कुँवरि जू देई देवी का विवाह अगोरी के राजा लालशाह जूदेव के प्रपौत्र एवं देवगढ़ के प्रथम ताल्लुक़ेदार महाराजकुमार बाबू गजराज सिंह के पौत्र कुँवर कीर्तिब्रह्म सिंह से हुआ। सन् 1735 ई. में काशिराज बलवन्त सिंह से युद्ध करते हुए मात्र 20 वर्ष की अल्पायु में कुँवर कीर्तिब्रह्म सिंह ने मातृभूमि के रक्षार्थ अगोरी के रण-संगर में अपना बलिदान कर दिया। बलिदानी पति के पार्थिव शरीर को लेकर कुँवरानी कनन कुँवरि जू देई देवी अगोरी में ही सती हो गयीं। आज गोठानी के सोमेश्वरनाथ महादेव-मन्दिर में स्थापित सतीस्तम्भ उनकी स्मृति को जीवन्त करता है। अगोरी दुर्ग के प्रवेश द्वार पर भी सतीस्थान है।  भदोही परगने के महामनीषी आचार्यकवि पण्डित राजनाथ मिश्र ने 'सती कनक कुँवरि स्तोत्र' में इस वैवाहिक सम्बन्ध का चित्रण किया है–

विन्ध्यगिरिराज की मनोरमा घरा में खिली,

चाँदनीलता की कलिता की छवि धारे थी।

कन्तित-नरेश की दुलारी दुहिता 'कनक',

विन्ध्यविसिनी-कृपा कटाक्ष को सँभारे थी।

दक्षजा सती के अनुराग में रँगी हुई-सी,

अनुसूया-सीता पर रोम रोम वारे थी।

प्राणवल्लभा थी कीर्तिब्रह्म सेनानायक की,

'राज' दोनों कुल को सतीत्व से निखारे थी।।


सिद्धपीठ वसुधा की कन्तित सुधा से षिक्त,

मिली देवगढ़ से धरातिसुखकन्दिनी।

शोणभद्र-से प्रशस्त कीर्तिब्रह्म वीर्यवान,

देवसरि-सी कनक पातकनिकन्दिनी।

मंजु माधुरी-सी मालतीलता-सी दिव्य,

अमलाकला-सी कमला-सी शुचिचन्दिनी।

गजराज सिंह के सुयश को बढ़ातीं 'राज',

सती बन राज रहीं युवराजनन्दिनी।।

– महामनीषी पण्डित राजनाथ मिश्र : 'सती कनक कुँवरि स्तोत्र देवीस्तोत्र', देववाणी से राष्ट्रवाणी तक (सम्पादक– सुरेशकुमार सिंह, I.A.S.), पृ. 353


कन्तित राज विजयपुर परिवार ने कीर्तिशेष श्रीमन्त राजा श्रीनिवासप्रसाद सिंह की 107वीं जयन्ती के अवसर पर कन्तित राज्य के संस्थापक राजा गूदनदेव की स्मृति में 'कन्तित-कीर्ति-कौमुदी सम्मान' का प्रवर्तन किया। इस सम्मान के परिकल्पना प्रमुख रूप से बैधा-गढ़वा-निवासी चिन्तक-मनीषी, राष्ट्रवादी विचारधारा के उन्नायक श्रीमान् बाबू राजेश सिंह गहरवार और कुशहा-निवासी अधिवक्ता श्रीमान् बाबू जैनेन्द्र सिंह गहरवार ने की। कन्तित राज विजयपुर परिवार के वर्तमान उत्तराधिकारी श्रीमान् अनिलप्रताप सिंह ने इस परिकल्पना को अपनी स्वीकृति से ऐतिहासिक आयाम प्रदान किया। इसी के साथ ही सामाजिक समरसता के लिए 'राजा वेणीमाधव सिंह सम्मान', शिक्षा के लिए 'मान-माधव सम्मान', समाजसेवा के लिए 'राजा श्रीनिवासप्रसाद सिंह सम्मान', धर्म-जागरण के लिए 'राजमाता रमाकान्त कुँवरि सम्मान' तथा संगीत-कला के लिए 'राजकुमारी आशालता हीरामणि सम्मान' का शुभारम्भ हुआ। गहरवार-नरेश महाराज भरतदेव के जामाता चन्देल-नरेश महाराज उड़नदेव एवं गहरवार-नरेश राजा युवराज सिंह के जामाता अमर बलिदानी कुँवर कीर्तिब्रह्म सिंह के वंशज तथा गहरवार-नरेश राजा दादूराय (1661-1681 ई.) के अनुज महाराजकुमार बाबू अचल सिंह के यशस्वी वंशज प्राचार्य बाबू दिनेशप्रताप सिंह (भिटहा) के जामाता, अर्थात् मुझको (डॉ. जितेन्द्रकुमार सिंह 'संजय') साहित्य-इतिहास के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर कन्तित-विजयपुर के प्राचीन गौरव को प्रतिपादित करने हेतु 'कन्तित-कीर्ति-कौमुदी सम्मान' प्रदान किया गया। इसी क्रम में सामाजिक समरसता के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने हेतु 'राजा वेणीमाधव सिंह सम्मान' चन्देल-नरेश महाराज उड़नदेव के वंशज महाराजकुमार बाबू दुर्जन सिंह के यशस्वी वंशज बाबू अरविन्द सिंह 'स्वामी अन्तरहंस' (सिरविट) को प्रदान किया गया। शिक्षा के क्षेत्र महनीय योगदान हेतु ज्ञानन्दा एकेडेमी की संस्थापक चन्देल-दुहिता श्रीमती डॉ. शीला सिंह को 'मान-माधव सम्मान', समाजसेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान हेतु बाबू बेचन सिंह गहरवार को 'राजा श्रीनिवासप्रसाद सिंह सम्मान', धर्म-जागरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान हेतु स्वामी कृष्णानन्द जी को 'राजमाता रमाकान्त कुँवरि सम्मान' तथा संगीत-कला के क्षेत्र में दीर्घकालीन योगदान हेतु संगीतज्ञ स्वामी मोहनदास को 'राजकुमारी आशालता हिरामणि सम्मान' से अलंकृत किया गया।


सभापति श्रीवद्धेश्वरनाथपीठाधीश्वर परमपूज्य महन्त डॉ. योगानन्द गिरि जी महाराज, मुख्य अतिथि श्रीमान् महाराव राजा महेन्द्रप्रताप सिंह (शंकरगढ़), विशिष्ट अतिथि श्रीमान् राजा श्रीचन्द्रविक्रमपद्मशरण शाह (विजयगढ़), श्रीमान् राजकुमार देवांशब्रह्म (अगोरी-बड़हर), श्रीमान् कुँवर अपूर्वब्रह्म (बिसहार) एवं संरक्षक श्रीमान् राजा अनिलप्रताप सिंह (कन्तित-विजयपुर/प्रतापगढ़) तथा बड़ी संख्या में उपस्थित कन्तित राज विजयपुर परिवार के विभिन्न घरानों के गहरवार-ठिकानेदार और अगोरी-बड़हर, विजयगढ़ के विभिन्न घरानों के चन्देल-ताल्लुक़ेदार इस ऐतिहासिक अवसर के साक्षी बने। 

कन्तित राज विजयपुर परिवार का यह सम्मान, सम्मिलन और सहभोज कार्यक्रम गिरिजापुर की सांस्कृतिक धार्मिक परम्परा का संवाहक सिद्ध होगा।

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