सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

महिर्ष भृगु ने अपनी श्री नाम की कन्या का पाणिग्रहण श्री विष्णु भगवान से किया था

 महिर्ष भृगु ने अपनी श्री नाम की कन्या का पाणिग्रहण श्री विष्णु भगवान से किया था। उस समय ब्रह्मा जी के सभी पुत्र, ऋषि एवं ब्राह्मण उपस्थित हुए। विवाहोपरान्त श्रीजी ने भगवान विष्णु से कहा- इस क्षेत्र में 12000 ब्राह्मण है, जो ब्रह्मपद की कामना करते हैं, इन्हें मैं स्थापित करूंगी और 36,000 वैश्यों को भी स्थापित करूंगी। और जो भी इतर जन होंगे वे भी भृगु क्षेत्र में निवास करेंगे उन सबकी अपने-अपने वर्णों में भार्गव संज्ञा होगी। भगवान विष्णु ने `एवमस्तु´ कहा।


इस प्रकार भारतवर्ष में भृगुवंशी भार्गव, च्यवन वंशी भार्गव, औविवंशी भार्गव, वत्सवंशी भार्गव, विदवंशी भार्गव, निवास करते हैं। ये सभी भृगुजी की वंशावली में से `भार्गव´ है। उत्तरीय भारत में च्यवनवंशी भार्गव है। गुजरात में भार्गव जाति के चार केन्द्र है, भड़ौंच, भाडंवी, कमलज और सूरत।


भिन्न-भिन्न क्षेत्र के भार्गव भिन्न-भिन्न नामों से जाने जाते हैं, जो इस प्रकार है- मध्यप्रदेशीय भार्गव- इनके गोत्र सं:कृत, कश्यप, अत्रि कौशल्य, कौशिक पूरण, उपमन्यु, वत्स, वशिष्ठ आदि हैं। प्रवरों में आंगिरस, कश्यप, वशिष्ठ, वत्स, गार्गायन, आप्नवान, च्यवन, शंडिल्य, गौतम, गर्ग आदि है। वंशों के नामों में व्यास, आजारज, ठाकुर, चौबे, दुबे ज्योतिषी, सहरिया, तिवारी, दीक्षित, मिश्र, पाठक, पुरोहित आदि हैं।


गुजराती भार्गव में कुछ लोग अपने नाम के अंत में भार्गव लिखते हैं। कुछ मुंशी, जोआकर, रावल, देसाई, जोशी, व्यास, अजारज, पाठक, ठाकुर, हीडिया, ठाकोर, चोकसी, थानकी, वीण, पटेल, सगोत, याज्ञिक, दीक्षित, शुक्ल, आसलोट आदि। सुप्रसिद्ध श्री के.एम. मुंशी इन्हीं में से एक हैं। इनकी एक मासिक पत्रिका `भृगु-तेज´ भी निकलती थी। दक्षिण में `भार्गवन´- (बंगलौर में `भार्गवन´ रहते हैं, वह भी भृगुवंशी है। नम्बूदरीपाद जाति (केरल में) भी कदाचित भृगुवंशी है।


वैदिक और संस्कृत साहित्य से स्पष्ट प्रकट होता है, कि प्राचीन काल में समस्त भारतवर्ष के ब्राह्मण एक ही जाति में सिम्मलित थे, और अपने गोत्रों (अति प्राचीनकाल में भार्गव आंगिरस आदि सात मूल गोत्र और पश्चात् काल में जामदगन्य शौनक आदि 18 गढ़ आर्षप्रवरो और सपिडों को छोड़कर अन्य सब के साथ विवाह कर लेते थे। ईसा के 11वीं शताब्दी तक के जो शिलालेख और ताम्र पत्र है उनमें ब्राह्मणों का वर्णन केवल उनके गोत्रों, प्रवरों तथा चरणों (वैदिक शाखाओं) द्वारा ही हुआ है। 12वीं शताब्दी के लेखों में ब्राह्मणों के अवांतर भेदों का वर्णन आरम्भ हो जाता है। इनमें से प्राचीन ब्रह्म-ऋषि देश के अर्थात् प्राचीन कौरव, उत्तर पांचाल, मत्स्य और शोरसेनक जनपदों के ब्राह्मण गौड़ कहलाए। तीसरी, चौथी शताब्दी ईण् में कुरुक्षेत्र के आस-पास के देशों में गुड-वंशी अर्थात् गौड़-गोत्री राजपूतों का राज्य था। कुरुक्षेत्र को अपना केन्द्र मानने वाले प्रान्त के ब्राह्मण `गौड़´ और उनके नाम से समस्त उत्तर-भारत के ब्राह्मण `पंचगौड़´ कहलाए।


पुराणों में से ऐतिहासिक विषय के संग्रह कर्ता और भारतवर्ष की एतिहासिक कथाओं के संशोधक मिपारजिस्टर वंशावली शुद्ध नहीं है, संथतवार व बताकर पीढ़ियों वार रखी गई है, मनु के काल से आरम्भ होकर महाभारत युद्ध के पश्चात् समाप्त होती है, उसके मतानुसार निम्नलिखित विख्यात पुरुष उनके आगे लिखी पीढ़ियों में भृगु वंश में जन्मे थे।


(1) च्यवन दूसरी पीढ़ी में (2) उशनस (शुक्र) पांचवी पीढ़ी में (3) शंड, मर्क और अप्तवान छठी पीढ़ी में (4) उर्व तीसवीं पीढ़ी में (5) ऋचीक इकत्तीसवी पीढ़ी में (6) जमदग्नि और अजगर्ति बत्तीसवीं पीढ़ी में (7) राम और शुन: शेफ चौतीसवीं पीढ़ी में (8) अग्नि और बीतहव्य चालीसवीं पीढ़ी में (9) वहयश्व बासठवीं पीढ़ी में (10) दिथोदास तिरेसठवीं पीढ़ी में (11) मित्रयुव और परूच्छेपिदेवोदास चौंसठवीं पीढ़ी में (12) मैत्रयुव, प्रवर्दन, देवोदास और प्रचेल्स पैंसठवीं पीढ़ी में (13) अनीर्ति पालच्छेपि और वाल्मीकि छासठवीं पीढ़ी में (14) सुमित्र वाहयश्व सड़सठवीं पीढ़ी में (15) देवापि शौनक इकहत्तरवीं पीढ़ी में (16) इन्द्रोत देवापि शौनक बहत्तरवीं पीढ़ी में (17) वैशम्पायन चौरनवीं पीढ़ी में


च्यवन वंशी चड़ भार्गव महाराज जनमेजय पाडव के समकालीन थे। (16 शताब्दी ढूसर भार्गव)

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

Katyuri Raza zalim singh

 Zalim Singh was born in 1723 in the village of Amorha, which is now located in Basti district, Uttar Pradesh. He belonged to the Suryavanshi Rajput clan, which is one of the most powerful Rajput clans in India. Zalim Singh's father, Raja Chhatra Singh, was the ruler of Amorha. Zalim Singh received a military education from a young age. He was a skilled horseman and swordsman. He also excelled in archery and shooting. Zalim Singh quickly rose through the ranks of the Amorha army. He became a general at a young age. The founder of the Amorha Suryavansh state in Basti was Raja Chhatra Singh. He was the father of Raja Zalim Singh, who was one of the most powerful Rajput rulers in Indian history. Chhatra Singh was born in 1685 in the village of Amorha, which is now located in Basti district, Uttar Pradesh. He belonged to the Suryavanshi Rajput clan, which is one of the most powerful Rajput clans in India. Chhatra Singh's father, Raja Uday Pratap Singh, was the ruler of Amorha. Chha...

श्रीनेत राजवंश

 # अयोध्या के सूर्यवंशी-नरेशों की गौरवशाली परम्परा में 130वें शासक महाराज सुमित्र थे। महाराज सुमित्र की 57वीं एवं अयोध्या के प्रथम सम्राट् वैवस्वत मनु की 186वीं पीढ़ी में महाराज शंखदेव पैदा हुए। महाराज शंखदेव के ज्येष्ठ पुत्र महाराज अजबाहुदेव पिता के पश्चात् राज्य के उत्तराधिकारी हुए और कनिष्ठ पुत्र महाराज दीर्घबाहुदेव के पुत्र महाराज बृजभानुदेव उपाख्य वसिष्ठसेन ने 332 ई. पू. में अयोध्या के सुदूर उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में अचिरावती नदी के अंचल में रुद्रपुर नामक राज्य की स्थापना करने के साथ ही 'श्रीनेत' पदवी धारण की। इस सम्बन्ध एक प्राचीन श्लोक प्रचलित है- तस्य पुत्रो दयासिन्धु बृजभानुः प्रतापवान्। श्रीनेत पदवीकेन लब्धा भुमिरनुत्तमा।। इस ऐतिहासिक सन्दर्भ का उल्लेख करते हुए महामहिमोपाध्याय डॉ. हीरालाल पाण्डेय लिखते हैं- अयोध्याया नृपः ख्यातः सुमित्र इति नामभाक्। पौरुषे सप्तपञ्चासे शङ्खदेवो नृपोभवत्।। शङ्खदेवस्य पुत्रौ द्वौ विख्यातौ क्षितिमण्डले। अजबाहुः नृपः श्रेष्ठ दीर्घबाहुः प्रतापवान्।। दीर्घबाहुः सुतः श्रीमान् बृजभानुः नृपोत्तमः। स एव हि वसिष्ठोऽपि प्रख्यां विन्दति भारते।। येन ...

भृगु वंशिय क्षत्रिय

 [02/05, 06:14] A B Pal: भृगु वंशिय क्षत्रिय और इसी वंश में पैदा हुए दधीचि के वंशज आज भी क्षत्रिय हैं तो परसुराम ब्रामण कैसे हुए परसुराम क्षत्रिय से ब्रम्ह को प्राप्त किया था [02/05, 06:14] A B Pal: देवी लक्ष्मी महर्षि भृगु और ख्याति की पुत्री थी। बाद मे शाप के कारण देवी लक्ष्मी को समुद्र में डूब कर रहना पड़ा था।सागर मंथन के समय नवरत्नों में देवी लक्ष्मी भी निकली थी। जिसे भगवान विष्णु ने पुनः पत्नी के रूप में ग्रहण किया था बाद के प्रसंग के अनुसार देवी लक्ष्मी समुद्र की पुत्री कहलाती है। [02/05, 06:14] A B Pal: महर्षि दधीचि भृगु वंश में पैदा हुए थे. वे भृगु वंश के महान ऋषियों में से एक थे.  महर्षि दधीचि की कहानी भृगु वंश से जुड़ी है, जो एक प्राचीन  वंश है. दधीचि ने देवताओं को अपने शरीर की हड्डियों का दान दिया था, जिससे इंद्र का वज्र बनाया गया था. इस दान के कारण, वे परम दानी और लोककल्याण के लिए समर्पित ऋषि के रूप में जाने जाते हैं. [02/05, 06:14] A B Pal: राजपूत वंशावली पेज नंबर-123 के अनुसार- नागौर जिले के परबतसर से चार मील की दूरी पर किनसरिया गाँव है ,जहाँ अरावली पर्वत शृ...