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अमोढ़ा राजा जालिम सिंह का गौरवशाली इतिहास

 अमोढ़ा राजा जालिम सिंह का गौरवशाली इतिहास

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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास जिन अमर शहीदों के लहू से लिखा गया, उनमें देश की आधी आबादी ने भी अपना योगदान दिया था।और इस विद्रोह के अन्त में ईस्ट इंडिया कम्पनी का भारत में शासन खत्म हो गया तथा ब्रिटेन सरकार का प्रत्यक्ष शासन प्रारम्भ हो गया जो कि अगले 90 सालों तक चला।

1857 के विद्रोह में सिर्फ़ बेग़म हज़रत महल और रानी लक्ष्मीबाई ने ही हिस्सा नहीं लिया था,मगर इस तथ्य से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि आज़ादी की लड़ाई में कंधे से कंधा मिला कर जिन गुमनाम क्रांतिवीरों तथा वीरांगनाओं ने सहयोग और समर्थन दिया, उनका तो कहीं जिक्र भी नहीं मिलता। दुर्भाग्य से उनमें से ज्यादातर को भुला दिया गया। जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष में अपना सर्वस्व बलिदान किया और देश की जनता पर अमिट छाप छोड़ी।

ऐसा ही एक अलिखित और अनछुआ मगर गौरवशाली इतिहास अयोध्या और बस्ती के बीच रामजानकी मार्ग पर बसा हुआ अति प्राचीन अमोढ़ा नामक राज्य का है।


तो दोस्तों,आइए अमोढ़ा राज्य का इतिहास ,भूगोल, उसकी स्थापना, सामाजिक संरचना, उसकी विकास यात्रा तथा आज़ादी की लड़ाई में इस गौरवशाली राज्य के अभूतपूर्व बलिदान की गाथा पर एक सिंहावलोकन करते हैं।


प्राचीन काल में अमोढ़ा कौशल देश का हिस्सा था। भगवान श्री राम जिनकी महिमा समस्त आर्यावर्त में फैली हुई है, उन्ही के कुलगुरु वशिष्ट मुनि का आश्रम अमोढ़ा राज्य में सरयू तट पर कहीं स्थित था।इसी आश्रम में स्थित गुरुकुल में भगवान श्री राम ने अपने भाइयों के साथ शस्त्र और शास्त्र की शिक्षा प्राप्त किया था।बस्ती के आगे वर्तमान में संतकबीरनगर तक इस राज्य की सीमा थी। त्रेता युग में वशिष्ट ऋषि के नाम पर ही इस क्षेत्र का नाम हुआ करता था।जो कालांतर में परिवर्तित होकर विशिष्टी और अब बस्ती के रूप में जाना जाता है।

गोस्वामी तुलसीदासजी ने मानस में एक चौपाई के माध्यम से इसका वर्णन भी किया है, “गुरु गृह पढ़न गए रघुराई,अल्पकाल विद्या सब पाई”।इसके अलावा भगवान श्रीराम और माता सीता का एक प्रसिद्ध मंदिर रामरेखा भी यहीं पर है। यह मंदिर रामायण काल का है। ऐसी मान्यता है कि सीता स्वयंवर में भाग लेकर भगवान श्रीराम माता सीता और पूरी बारात सहित एक दिन के लिए यहीं रुके थे। यहाँ रात्रि विश्राम के पश्चात भगवान श्रीराम माता सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या गए थे। इस मार्ग को ही राम जानकी मार्ग के नाम से प्रसिद्धी मिली है।


700 ई॰पू॰ में भारत जनपदों में बँटा था इस समय भारत में 16 महाजनपद और इनके अंतर्गत बहुत से छोटे छोटे जनपद थे। इनमें अवंती,मगध,वत्स और कौशल महाजनपद प्रमुख थे। कौशल जनपद में राजा राहुल “महाकौशला” का शासन था। राजा राहुल “महाकौशला” ने काशी,लुम्बनी,कपिलवस्तु,कौलिय आदि राज्यों को जीत कर एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की थी। कौशल राज्य की राजधानी साकेत यानी कि अयोध्या थी। साकेत (अयोध्या) श्रावस्ती व वाराणसी कौशल राज्य के प्रमुख नगर थे। महाकौशला के बाद प्रसेनजित, क्षुदृक, रणक, सुरथ, सौमित्र अयोध्या के राजा हुये। सौमित्र अयोध्या के अंतिम सूर्यवंशी राजा थे। कालांतर में मगध नंदवंश,के शासक महापदमनंद ने सौमित्र को हराकर सूर्यवंशी किंगडम को समाप्त कर दिया।


तद्पश्चात चन्द्रगुप्त मौर्य ३२२-२९८ ई॰पु॰में भारत के महानतम सम्राट बने। इन्होंने मौर्य साम्राज्य की स्थापना की थी। चन्द्रगुप्त और फिर उनके पौत्र सम्राट अशोक पूरे भारत को एक साम्राज्य के अधीन लाने में सफल रहे।

मौर्यों के पतनके बाद “शुंग वंश” एवं “गुप्त वंश” तक अयोध्या राज्य तथा अमोढ़ा की महत्ता बरकरार रही। छठी शताब्दी में गुप्त शासन की गिरावट के साथ अमोढ़ा धीरे – धीरे उजाड़ हो गया, इस समय मौखरी नामक एक नया राजवंश सत्ता में आया, जिसकी राजधानी कन्नौज थी। 

7वीं शताब्दी में, सम्राट हर्षवर्धन कन्नौज के सिंहासन पर बैठे। वह भी सूर्यवंशी सम्राट थे मगर बैसवारा राज्य से सम्बंधित होने के कारण बैस उनकी उपाधि हो गयी।कवि बाणभट्ट ने हर्षचरित्र में इसका उल्लेख किया है। वे बड़े वीर,पराक्रमी और योग्य शासक थे।सातवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में मालवों,गुर्जरों,शक और हूणों के छुट-पुट उपद्रव उत्तर-पश्चिम सीमा पर प्रायःहोते रहते थे।जिसका सम्राट हर्ष ने बड़ी बहादुरी से सामना किया।तथा अवध की महिमा को बरकरार रखा।


9वीं शताब्दी की शुरुआत में,गुर्जर,प्रतिहार राजा, नागभट्ट द्वितीय ने अयोध्या से कन्नौज के शासन को उखाड़ फेंका और यह क्षेत्र उनके नये बनते शासन की राजधानी बना,जो राजा महीरा भोज प्रथम(836 – 885 ई.) के समय में बहुत ऊचाई पर था।


(1170-1194) में नये उभरते शक्ति गढ़वाल राजा जयचंद् इस वंश के अंतिम और महत्वपूर्ण शासक थे जो हमलावर सेना मुहम्मद गौरी के खिलाफ चँद॔वार की लड़ाई (इटावा के पास) में मारे गये थे, और उनकी मृत्यु के तुरंत बाद कन्नौज,तुर्कों के कब्जे में चला गया।

मुहम्मद गोरी के शासनकाल के दौरान,कन्नौज के सत्ता में गिरावट शुरू हो गई थी, और अवध छोटे-छोटे हिस्सों में विभाजित हो गया था।


किंवदंतियों के अनुसार,सदियों से अमोढ़ा क्षेत्र एक जंगल था और इस क्षेत्र के अधिकतर भाग पर डोम, डोमकटारों और भरों का कब्जा था। भरों के मूल और उनके इतिहास के बारे में तो कोई निश्चित प्रमाण उपलब्ध नहीं है। कई इतिहास कार यह मानते हैं कि राजभर, डोम, डोमकटार ये सभी जातियाँ शक और हूँड़ो के समय उनके सेनानी हुआ करते थे, इन्होंने यहाँ शक और हूँढ़ आक्रमण के समय काफी उत्पात मचाया था, और इस परिक्षेत्र को जीतने के पश्चात् यहीं अपना राज्य स्थापित किया। बस्ती क्षेत्र में डोमिनगढ और गोण्डा में डोमरिया डीह आज भी इनके प्रमाण के रूप में मौजूद हैं।


राजभरों के बारे में कुछ इतिहास कारों का कहना है भारशिव ही राजभर होते हैं। बहराइच में सूर्यकुंड पर स्थित बालार्क सूर्य मंदिर अर्थात् सूर्योदय जो भगवान सूर्य को समर्पित था।

उस स्थान पर प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ मास मे प्रथम रविवार को, बड़ा मेला लगता था। वहां यह परंपरा काफी प्राचीन थी। भारशिव राजाओं का साम्राज्य पश्चिम में मथुरा और पूर्व में काशी से भी कुछ दूर तक विस्तृत था। इस सारे प्रदेश में बहुत से उद्धार करने के कारण इन्होंने गंगा-यमुना को ही अपना राजचिह्न बनाया था। गंगा-यमुना के जल से अपना राज्याभिषेक कर इन राजाओं ने बहुत काल बाद इन पवित्र नदियों के गौरव का पुनरुद्धार किया तथा भारशिव नाम से नये राजवंश का उदय हुआ। ये सूर्यवंशी, अर्कवंशी शासक भगवान सूर्य एवं भगवान शिव के उपासक थे। साधारण जनता अज्ञानता वश उन्हें राजभर कहने लगी।

शैव धर्म का अनुशरण करते हुये वैदिक काल में राजभर क्षत्रिय के नाम से प्रचलित हुए। उन्होंने उत्तर भारत के बड़े हिस्सों पर राज किया।

वे अपनी गर्दन के चारों ओर रुद्राक्ष पहनते थे,और शिव के वजन के बराबर(भार) लेते थे, को भारशिवा कहा गया जिसका अपभ्रंश बाद में राजभर हो गया।

मान्यता है की भर लोग मुख्यता दो कुलो मे बटे हुये थे। एक “शिवभर” तथा दूसरा “राजभर”।शिवभरों का कार्य राजसत्ता से दूर हाथ मे त्रिशूल लेकर विचरण करना था, जबकि राजभर का कार्य राजसत्ता स्थापित कर शासन चलाना था। शिवभर तथा राजभर दोनों ने मिलकर विंध्यशक्ति नामक मजबूत संगठन बनाया। और राजभर प्रवरसेन को उसका नेता चुना गया।सन 284 ई में  गंगा के पवित्र जल की सौगंध खाकर दोनों एक हुये और कहलाए “भारशिव”।भारशीवों का गौरवशाली इतिहास वीरान खंडहर, टीले,एवम मंदिर-स्तूप उनके पराक्रमी अतीत को आज भी जीवित रखे हुये है।

विख्यात राजा सुहलदेव को भी कई इतिहासकार इसी कुल का मानते हैं। उनका साम्राज्य उत्तर मे नेपाल से लेकर दक्षिण मे कौशाम्बी तक तथा पूर्व मे वैशाली से लेकर पश्चिम मे गढ़वाल तक फैला था।

भूराय्चा का सामंत सुहलदेव का छोटा भाई भुराय्देव था जिसने अपने नाम पर भूराय्चा दुर्ग बनवाया तथा इसका नाम रखा भरराइच ।

श्री देवकी प्रसाद अपनी पुस्तक राजा सुहलदेव राय मे लिखते हैं कि भूराय्चा से भरराइच और भरराइच से बहराइच बन गया। प्रो॰ के. एल. श्रीवास्तव के ग्रन्थ बहराइच जनपद का खोजपूर्ण इतिहास के पृष्ट ६१-६२ पर अंकित है - इस जिले की स्थानीय रीती रिवाजो मे आज भी राजा सुहलदेव पाए जाते है।


इसप्रकार अधिकतर प्रख्यात विद्वानों ने अपने अध्यन के फलस्वरूप सम्राट सुहलदेव को सूर्यवंशी क्षत्रिय और राजभर का “शासक”माना है। राजभरों का या किसी भी जाती या समाज का शासक होना ये कदापि साबित नहीं करता कि राजा सूहैलदेव भी राजभर ही थे। प्रो. जयसवाल ने भी अपनी पुस्तक "अंधकार युगीन भारत" मे भरो को भारशिव वंश का क्षत्रिय माना है।


अर्कियोलोजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के वॉल्यूम १ पेज ३२९ मे लिखा है की राजा सुहलदेव क्षत्रिय थे और राजभरों के शासक थे।

कहा जाता है कि राजा सूहैलदेव ने 11वीं शताब्दी की शुरुआत में बहराइच में ग़ज़नवी सेनापति सैयद सालार मसूद ग़ाज़ी जिसकी १ लाख तुर्कों की सेना थी, को उस क्षेत्र के तमाम राजाओं को एकत्र कर एक विशाल संयुक्त सेना के साथ उस धर्मान्ध गाजी को ललकार कर पराजित किया और मार डाला था। बहराइच में आज भी उसकी मज़ार है जहां प्रतिवर्ष मई और जून महीने में बड़ा मेला लगता है। इतिहासकार कहते हैं कि यदि राजा सूहैलदेव क्षत्रिय ना रहे होते तो उस क्षेत्र के तमाम क्षत्रिय राजा उनके ध्वज के नीचे युद्ध करने को कदापि राज़ी नहीं होते।

सालार मसूद और सुहेलदेव की कथा फारसी भाषा के मिरात-ए-मसूदी में पाई जाती है। यह मुगल सम्राट जहाँगीर (1605-1627) के शासनकाल के दौरान अब्द-उर-रहमान चिश्ती ने लिखी थी। पौराणिक कथा के अनुसार, सुहेलदेव श्रावस्ती के सूर्यवंशी राजा के सबसे बड़े पुत्र थे। पौराणिक कथाओं के विभिन्न संस्करणों में, उन्हें सकरदेव, सुहीरध्वज, सुहरीदिल, सुहरीदलध्वज, राय सुह्रिद देव, सुसज और सुहारदल समेत विभिन्न नामों से जाना जाता है।


1225 ई.में इल्तुतमिश का बड़ा बेटा,नासिर-उद-दीन महमूद,अवध का गवर्नर बन गया और इसने भरों तथा छोटे राजाओं को पूरी तरह कुचल डाला। इस दमनात्मक कार्यवाही के बाद अमोढ़ा क्षेत्र में भरों की सत्ता लगभग समाप्त हो गई थी। यद्यपि छिटपुट रूप में यहां राजभरों,डोम और डोमकटारों तथा कन्नौज के गुर्जर प्रतिहारों के शासन के अनेक प्रमाण प्राप्त होते हैं।

जनश्रुतियों के अनुसार यह ज्ञात होता है कि राजपूतों के आगमन के पूर्व यहां के प्राचीन राज्यों के शासक भर और डोम हुआ करते थे।

अमोढ़ा राज्य में राजपूतों के आगमन से पूर्व कायस्थ समाज जागीरदार के रूप में शासित था। इस वंश के संस्थापक राय जगत सिंह थे। एक जनश्रुति कहती है कि उन्होंने गोण्डा के डोमरिया डीह के डोम राजा जो ब्राहमण पुत्री से शादी करना चाहता था,1376 ई. मे कायस्थ राय जगतसिंह ने उसे हराया था। इसी लिए उन्हें अमोढ़ा का राज पारितोषिक रूप में मिला था।


13वीं शताव्दी के मध्यकाल 1275 ई. के लगभग अमोढ़ा में श्रीनेत्र राजपूत आए थे। जिसे मूलतः सूर्यवंशी कहा गया है। ये सर्व प्रथम गोरखपुर एवं अमोढ़ा में आये थे। इसके बाद वे मुख्यतःमगहर में बसे।इस मंडल का प्रथम राजपूत वंश श्रीनेत या सरनत था। इसके प्रधान चन्द्रसेन ने गोरखपुर तथा पूर्वी अमोढ़ा से डोमकटारों को निकाला था। चन्द्रसेन की मृत्यु के बाद उनका पुत्र जयसिंह उत्तराधिकारी बना।उनका राप्ती नदी के दक्षिण बांसी तथा सत्तासी में राज्य था।


कुछ कथायें कहती हैं कि चूँकि प्रत्येक राजपूत वंश अवध से सम्बंधित था, और सभी राजपूत राजाओं के मुखिया सूर्यवंशी क्षत्रिय राजा कान्हदेव सिंह थे। सूर्यवंशी राजा कान्हदेव के द्वारा महुली,महसों की भांति अमोढ़ा में भी क़ाबिज़ कायस्थों को पराजित करके निकाल दिया गया था। इस अभियान में उन्हें आंशिक सफलता मिली थी। इन्होंने काफी वर्षों तक राज किया।


राजा कान्हदेव के बाद इस अभियान की बागडोर उनके पुत्र कंशनारायण सिंह ने सँभाली और इस परिक्षेत्र के समस्त भूभाग कायस्थ राजा से जीतकर पूरे अमोढ़ा राज्य को अपने अधीन किया। इस प्रकार अमोढ़ा राज्य पर एक बार पुनः सूर्यवंशी ध्वजा लहरा उठी।

और इनके शासन काल में अमोढ़ा राज्य में काफी समृद्धि एवं ख़ुशहाली छा गयी थी।इन्होंने तक़रीबन ४० वर्षों तक राज काज सम्भाला।

इस्लाम के आने पर यहाँ के सत्ताविहीन कायस्थ वंश राजकीय सहायक के रूप में अपनी सेवाएँ देने लगे थे। उन्ही कायस्थों में एक परिवार अमिताभ बच्चन जी का भी था, जिनके पूर्वज अमोढ़ा रियासत को अपनी सेवा देते थे। स्व. डा. हरिवंशरॉय बच्चन के पूर्वजों का बचपन भी अमोढ़ा में बीता। उनके पिता अमोढ़ा रियासत के राजकर्मचारी थे। डा. हरिवंशराय बच्चन ने अपनी एक रचना “क्या भूलूँ,क्या याद करूँ”  में अमोढ़ा का पूरा ज़िक्र किया है। भारत के प्रथम राष्ट्रपती डा.राजेंद्र प्रसाद का परिवार भी अमोढ़ा राज्य के कुवाँगाँव में रहा करता था। राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने अमोढ़ा और कुँवागाँव का ज़िक्र करते हुए कहा था की अमोढ़ा में उनके पुरखों का नार गड़ा है।


1526 ई. में बाबर ने मुग़ल राज्य की स्थापना की, और उसके सेनापति मीरबाक़ी ने 1528 में अयोध्या पर आक्रमण करके रामजन्मभूमि को ध्वस्त करके उसी स्थल पर मस्जिद बनवाई।जब मंदिर तोड़ा जा रहा था तब इसका विरोध अमोढ़ा राज्य ने बहुत प्रचण्डता के साथ किया था। उस समय अमोढ़ा की गद्दी पर सूर्यवंशी कुल गौरव महाराज वीर सिंह विराजमान थे,जो इस राजकुल के २१वें शासक थे।मीर बाकी की सेना के साथ भयंकर युद्ध लड़ा गया,इस महा संग्राम में राजा नगर,राजा भीटी,राजा हंसवर, मकरही,खजूरहट दीयरा,अमेठी आदि रजवाड़ों के साथ अमोढ़ा के तत्कालीन राजा वीरसिंह मंदिर बचाने के लिए बाबर की सेना से युद्ध लड़े। कई दिनों तक युद्ध चला और हजारों वीर सैनिक शहीद हो गए। मगर बाबर की सेना जीत गई। कहते हैं कि इस युद्ध में अमोढ़ा राज्य के सभी गाँव के राजपूत परिवारों ने भाग लेकर रामजन्मभूमि रक्षार्थ अपने जीवन का बलिदान दिया था।

इतिहासकार कनिंघम अपने 'लखनऊ गजेटियर' के 66वें अंक के पृष्ठ 3 पर लिखता है कि 1,74,000 हिन्दुओं की लाशें गिर जाने के पश्चात मीर बाकी अपने मंदिर विद्ध्वंस अभियान में सफल हुआ।


अकबर ने जब 1580 ई. में अपने साम्राज्य को 12 सूबों में विभक्त किया, तब उसने 'अवध'का सूबा भी बनाया और अयोध्या को ही इसकी राजधानी बनाया।


1707 ई. जब औरंगजेब की मृत्यु हुई,तब सम्राट बहादुरशाह ने कुलिच खान को अवध का सूवेदार और गोरखपुर का फौजदार नियुक्त किया, 1710 ई. में उसने पद से त्यागपत्र दे दिया। उसके त्यागपत्र से स्थानीय राजाओं को अपने-अपने क्षेत्र में धाक जमाने का अवसर प्राप्त हो गया। प्रत्येक राजा व्यवहारिक रूप से अपने क्षेत्र में स्वतंत्र हो गया। तथा उन्होंने मुग़लों को लगान देना बंद कर दिया। इन राज्यों की स्वतंत्र स्थिति वाइन के “सेटेलमेट रिपोटर्” में वड़ी प्रमुखता से प्रकाशित हुआ।


उक्त परिस्थिति का लाभ उठाकर तत्कालीन राजा अमोढ़ा “संग्राम सिंह” जो कि राजा वीरसिंह के बड़े पुत्र थे,उन्होने भी अपना स्वतंत्रत राज्य विस्तार आरम्भ कर दिया। ये स्थिति १० वर्षों तक चली,और फुरखसियर के बादशाहत में पुनः मुग़लों के अधीन हो गई।

अमोढ़ा राज्य के सूर्यवंशियों का स्वर्णिम काल सन 1732 से शुरू हुआ जब अमोढ़ा राजघराने की 24वीं पीढ़ी में राजा साहेब सिंह के बड़े पुत्र,सबसे निडर,सबसे पराक्रमी और साहसी राजा जालिम सिंह ने सत्ता सम्भाली।


ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि राजा जालिम सिंह का समय एक तरह से अमोढ़ा के लिए स्वर्णकाल कहा जा सकता है।उस दौरान अमोढ़ा ने जो समृद्धि हासिल की वैसा दोबारा नहीं कर सका। उस दौर में यहां कई इमारतों तथा सड़कों का निर्माण हुआ,जिनकी निशानियां आज भी मौजूद हैं।अमोढ़ा में बेहतरीन किला तथा अमोढ़ा से ४ किलोमीटर दूरी पर स्थित पखेरवा में शानदार राजमहल इन्ही के शासन काल में बना।अमोढ़ा के किले में स्थित महल के नीचे से पखेरवा तक चार किलोमीटर सुरंग भी हुआ करती थी।


मुग़लों तथा अंग्रेज़ों की संयुक्त शक्ति का सामना करने के लिए उन्होंने नये सिरे से सेना का संगठन किया तथा सेना की सुदृढ़ मोर्चाबंदी करके अपने सैन्य कौशल का परिचय दिया।अपने शासन के दौरान उन्होंने अत्यधिक सूझबूझ के साथ प्रजा के लिए कार्य करते रहे।अपने इसी स्वभाव से वे अपनी प्रजा के स्नेहभाजन बन गए।उन्होंने क़िले के अन्दर ही एक व्यायामशाला बनवाई और सैन्य प्रशिक्षण,शस्त्रादि चलाने तथा घुड़सवारी हेतु आवश्यक प्रबन्ध किए।

राजा जालिम सिंह की बदौलत अमोढ़ा की आर्थिक स्थिति में अप्रत्याशित सुधार हुआ।खेती के अवकाश के दौरान यहाँ बढ़ई,लुहार,सुनार,नाई,धोबी,कुम्हार,धुनिया,जुलाहे,बुनकर,मोची,वेलदार तथा वैद्य सभी देशी कुटीर उद्योग में व्यस्त रहते थे,इनके बनाए हुए उत्पाद के लिए बाज़ार राजा स्वयं उपलब्ध कराते थे।इन उत्पादों की बड़ी माँग थी,इनके क्रय और विक्रय के माध्यम से प्राप्त धन से प्रजा आर्थिक,सम्पन्न थी।इस व्यवस्था के उपरान्त राज्य की प्रजा उन्हें मसीहा मानने लगी। राजा साहब अश्वारोहण और शस्त्र–संधान में काफी निपुण थे। उन्होंने एक विशाल सेना खड़ी की जिसका संचालन वह स्वयं करते थे। 


पड़ोसी राज्य भी राजा जालिम सिंह से बहुत प्रभावित थे।राजा साहब ने पड़ोसी राजाओं को अपने प्रभाव में लेकर उनसे मैत्रिपूर्ण सम्बन्ध स्थापित किया। गौतम वंशीय राजा नगर के यहाँ से मधुर वैवाहिक सम्बन्ध जोड़ा। तथा बस्ती कलहँसों के कुल से भी विवाहेत्तर सम्बन्ध कायम रखते हुए उन्हें अभय प्रदान किया।श्रीनेत्र राजपरिवार से अपना मधुर सम्बन्ध स्थापित किया तथा इस कुल में अपनी बहन का विवाह सम्पन्न कराया,और उन्हें जागीर भी प्रदान किया।


महाराजा जालिम सिंह के सूझ-बुझ और सुव्यवस्थित शासन प्रणाली की वजह से अमोढ़ा राज्य उत्तरोत्तर प्रगति कर रहा था,इसी बीच सादत खान,जो अवध के दूसरे नवाब थे,और उनके शहज़ादे शुजाउद्दौला ने 1739-54 में अयोध्या को अपना सैन्य मुख्यालय बनाया,तथा फ़ैज़ाबाद में किले का निर्माण कराया इसी क़िले को अवध की राजधानी बनाई।ये वह दौर था जब अमोढ़ा अपनी बुलंदियों पर था। फ़ैज़ाबाद में सैन्य मुख्यालय और अवध की राजधानी हो जाने की वजह से अमोढ़ा विधर्मी संस्कृति से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका,क्योंकि नवाब उधर से अपनी तहजीब और रंग ढंग भी लेते आए थे।ये बात राजा जालिम सिंह को अंदर ही अंदर सालती रहती थी।

उधर नवाब शुजाउद्दौला ने भी पड़ोसी राज्य होने की वजह से और अमोढ़ा राज्य की सम्पन्नता,तथा राजा साहब की वीरता से प्रभावित होकर उनसे मित्रता कायम कर लिया, मगर अफ़सोस,कि मुग़लों से बहुत सीमा तक दोस्ती का अर्थ यह था कि नवाब जैसे चाहें वैसे शासन चला सकें। 

वास्तव में अमोढ़ा राज्य के स्वामी का स्थान शुजाउद्दौला लेता जा रहा था। यह बात राजा जालिम सिंह जैसा स्वाभिमानी राजा कदापि सहन नहीं कर सकता था।इसी बात को लेकर महाराज और नवाब के बीच कुछ मनमुटाव हो गया था।


इसी बीच सन १७६१ में अहमद शाह अब्दाली और मराठों के बीच पानीपत के मैदान में घमासान युद्ध हुआ, इस युद्ध में नवाब शुजाऊद्दौला ने समस्त पड़ोसी हिंदू राजाओं के विचार से अलग जाकर अब्दाली का साथ दिया, नवाब तथा अब्दाली की संयुक्त सेना से मराठों की सेना को बुरी तरह पराजित हुई।इस ख़ुशी में फ़ैज़ाबाद गुलाबवाड़ी में नवाब द्वारा नृत्य-संगीत के रंगारंग प्रोग्राम का आयोजन किया गया,जिसमें उस क्षेत्र के तमाम रजवाड़े आमंत्रित थे,राजा जालिम सिंह जी उस आयोजन में विशिष्ट मेहमान के तौर पर आमंत्रित थे, प्रोग्राम के मध्य में कुछ बातें राजा जालिम सिंह को नागवार गुजरीं, जिससे नवाब और राजाजी के बीच कहासुनी हो गई, नवाब ने अपने सैनिको से महाराज को बन्दी बनाने का आदेश दे दिया,मुग़ल सैनिक राजासाहब को गिरफ़्तार करने आगे बढ़े,तब तक बहुत देर हो चुकी थी, बिजली की चमक बिखेरती राजा जालिम सिंह की तलवार म्यान से बाहर निकल चुकी थी।उनकी तलवार के बेग के सामने नवाब का कोई सैनिक टिक नहीं सका,सभी मुग़ल सैनिकों को छठी का दूध याद दिलाते हुए राजा जालिम सिंह नवाब की घेराबंदी को तिनके की तरह बिखेर कर,घोड़े के साथ सरयू नदी के तट पर पहुँचे।उस समय दोनो पाटों पर बहती नदी को रात्रि में तैर कर पार किया।इस घटना के बाद से पैदा हुआ मन मुटाव सन १७६४ के बक्शर युद्ध में समाप्त हुआ,जब राजा जालिम सिंह के द्वारा अंग्रेजों के विरुद्ध सुजाउद्दौला का साथ दिया गया।


दरअसल ईस्टइंडिया कंपनी के रूप में अंग्रेज़ों ने बहुत समय से अवध की दौलत पर आँखें गड़ा रखी थी।अंग्रेजों की दृष्ठि से सबसे अधिक दर्दनाक था शुजाउद्दौला द्वारा बंगाल पर आक्रमण,जिसके बाद उन्होंने कुछ समय तक कलकत्ता पर शासन भी किया था। 

लेकिन १७५७ में प्लासी तथा १७६४ में बक्सर की लड़ाई में अंग्रेज़ों की जीत के बाद नवाब पूरी तरह मटियामेट हो गए। युद्ध समाप्त होने के बाद अवध ने अपनी काफ़ी ज़मीन खो दी थी।फिर भी सतही तौर पर ही सही,हमेशा के जानी दुश्मन नवाब शुजाऊद्दौला अंग्रेजों के दोस्त बन गए और ब्रिटिश संसद में,तथा संपूर्ण भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रमुख मित्र के तौर पर नवाब के तारीफ़ के पुल बाँधे गए।


बक्शर युद्ध के बाद नवाब थोड़ा थोड़ा करके अपनी आज़ादी खोते गए। पहले चुनार का किला और फिर बनारस और ग़ाज़ीपुर के जिले और फिर इलाहाबाद का किला अंग्रेजों को दे दिया।

9 सितम्बर 1772 में सआदत खान को अवध सूबे का राज्यपाल नियुक्त किया गया जिसमे गोरखपुर का फौजदारी भी था। इसके ठीक एक वर्ष बाद सन १७७३ में नवाब ने लखनऊ में ब्रिटिश रेज़िडेंट पद स्वीकार करने का आत्मघाती कदम उठाया,इसकी बदौलत विदेश नीति पर सारा नियंत्रण ईस्ट इंडिया कम्पनी का हो गया तथा अवध का वास्तविक शासक रेज़िडेंट ही हो गया।


कहते हैं राजा अमोढ़ा और काशी नरेश के बीच बहुत अच्छे सम्बन्ध थे।,तत्कालीन काशी नरेश राजा चेत सिंह और जनरल वारेन हेस्टिंग्स में ठन गयी।जनरल ने राजा पर अंधाधुंध टैक्स लाद दिया। दरअसल अमोढ़ा के साथ काशी भी सन् 1775 तक अवध राज्य के अधीन था लेकिन नवाब शुजाउद्दौला की मृत्य के बाद काशी नरेश तथा उनके साथ कई राजाओं ने स्वयं को अवध की सत्ता से अलग कर लिया। उन राजाओं में अमोढ़ा राजा जालिम सिंह भी थे। काशी नरेश चेतसिंह,अमोढ़ा नरेश राजा जालिम सिंह तथा अन्य कई राजाओं से वारेन हैसटिंग्स ने संधि कर इन सभी राज्यों को कंपनी के अधीनता में ले लिया।और इन राज्यों से कम्पनी ने स्वयं लगान लेना शुरू कर दिया।

सन् 1780 आते-आते हेस्टिंग्स ने काशी नरेश पर 50 लाख रुपए जुर्माना थोप दिया।इस जुर्माने को वसूलने जुलाई 1780 में वारेन हेस्टिंग्स बनारस आ धमका।वर्तमान काशी राज परिवार जो राजा चेत सिंह का मंत्री हुआ करता था,उसकी ग़द्दारी से अंग्रेजों ने चेतसिंह को बंदी बना लिया,और राजा चेत सिंह को काशी राज्य छोड़कर पलायन करना पड़ा।

इस घटना और अपने मित्र राजा चेत सिंह के अपमान से तथा अंग्रेजों की बर्बरता से क्रोधित महाराजा जालिम सिंह ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह कर दिया,और स्वतंत्रता संग्राम में मजबूत संकल्प के साथ कूद पड़े।राजा साहब से श्रीनेत राजा सत्तासी,गौतम राजा नगर और राजा बहराइच भी बहुत प्रभावित थे और अपने अपने राज्यों में उन्होंने भी अंग्रेजों को नाकों चने चबवाना शुरू कर दिया।


अमोढ़ा राज्य के भीषण विरोध के बाद वारेंन हेस्टिंग्स के कान खड़े हो गए थे।वह अपनी सेना अमोढ़ा की तरफ़ कूच करने ही वाला था,मगर उस समय पश्चिम में मराठाओं से और दक्षिण में टीपू सुल्तान के साथ भीषण युद्ध में व्यस्त होने के कारण वह अपनी सेना अमोढ़ा की तरफ नहीं भेज सका।

तभी ब्रिटिश संसद ने पिट्स इंडिया एक्ट पारित  कर दिया ,जिसमें स्पष्ट कर दिया गया था कि भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी देशी रियासतों के प्रति अहस्तक्षेप का रास्ता अपनाए। यह 1784 का दौर था।इस क़ानून के बाद सन 1785 में वारेन हेस्टिंग्स ब्रिटेन वापस बुला लिया गया।

इस मौक़े का लाभ उठाकर राजा जालिम सिंह ने अपना छापामार युद्ध जारी रखा,और समय समय पर घात लगाकर अंग्रेजों को छकाते रहे।उनके छापामार युद्ध से अंग्रेज अफ़सर और सिपाही इतना घबराए हुए थे,कि उन्होंने अमोढ़ा राज्य की तरफ़ देखना ही छोड़ दिया था। 


अंग्रेजों की विशाल सैन्य शक्ति के सामने उनकी सेना बहुत छोटी थी तथा संसाधन भी बहुत सीमित थे। इसकी परवाह किए बिना उन्होंने अमोढ़ा राज्य के प्रत्येक क्षत्रिय परिवारों के एक सदस्य को अपनी सेना में भर्ती होने का आह्वान किया और उन्हें युद्ध कला का अभ्यास कराया।उन्होंने अपनी सेना में पठानो को भी भर्ती किया और अपनी सेना की अग्रिम पंक्ति में जगह दिया,यह उनके व्यक्तित्व का ही कमाल था कि क्षत्रिय सैनिकों की तरह पठान सैनिक भी उनके लिए सदैव जान देने को तैयार रहते थे।


१७८३ तक उन्होंने आसपास के क्षत्रिय और पठानो तथा सन्यासी आंदोलन के घुमक्कडो जिसमें मदारी और बरहना जाती के लोग थे अपने साथ मिलाकर 11000/ सैनिकों की सेना तैयार कर ली थी। उनके रुतबे का जनसाधारण पर बड़ा असर था,अंग्रेज इसी लिए परेशान रहते थे।अंग्रेज़ों की विशाल सैन्य शक्ति के सामने उन्होंने गुरिल्ला युद्ध अपनाया।छिट-पुट संघर्ष में अंग्रेज कई बार परास्त हुए।इस तरह राजा जालिम सिंह १७८५ तक अंग्रेजो से लगातार लड़ते रहे।


फिर वह मनहूस दौर भी आया,अमोढ़ा राज्य द्वारा मुग़लों की अधीनता अस्वीकार कर देने की वजह से मृतक नवाब शिराजुद्दौला का शहज़ादा आसिफुद्दौला राजा जालिम सिंह से खार खाए बैठा था।उसने मेजर क्राऊफ़ोर्ड को 15 जनवरी 1786 को एक पत्र लिखकर राजा अमोढ़ा,राजा सत्तासी,(गोरखपुर) राजा बहराइच को सबक़ सिखाने के लिए एक बड़े सैनिक रेजिमेंट को जल्द से जल्द अमोढ़ा भेजने की माँग की



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