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अगस्त, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सरयूपारीण ब्राहमणों के मुख्य गाँव :

 सरयूपारीण ब्राहमणों के मुख्य गाँव :  गर्ग (शुक्ल- वंश) गर्ग ऋषि के तेरह लडके बताये जाते है जिन्हें गर्ग गोत्रीय, पंच प्रवरीय, शुक्ल बंशज  कहा जाता है जो तेरह गांवों में बिभक्त हों गये थे| गांवों के नाम कुछ इस प्रकार है| (१) मामखोर (२) खखाइज खोर  (३) भेंडी  (४) बकरूआं  (५) अकोलियाँ  (६) भरवलियाँ  (७) कनइल (८) मोढीफेकरा (९) मल्हीयन (१०) महसों (११) महुलियार (१२) बुद्धहट (१३) इसमे चार  गाँव का नाम आता है लखनौरा, मुंजीयड, भांदी, और नौवागाँव| ये सारे गाँव लगभग गोरखपुर, देवरियां और बस्ती में आज भी पाए जाते हैं| उपगर्ग (शुक्ल-वंश)  उपगर्ग के छ: गाँव जो गर्ग ऋषि के अनुकरणीय थे कुछ इस प्रकार से हैं| बरवां (२) चांदां (३) पिछौरां (४) कड़जहीं (५) सेदापार (६) दिक्षापार यही मूलत: गाँव है जहाँ से शुक्ल बंश का उदय माना जाता है यहीं से लोग अन्यत्र भी जाकर शुक्ल     बंश का उत्थान कर रहें हैं यें सभी सरयूपारीण ब्राह्मण हैं| गौतम (मिश्र-वंश) गौतम ऋषि के छ: पुत्र बताये जातें हैं जो इन छ: गांवों के वाशी थे| (१) चंचाई (२) मधुबनी (३) चंपा (४) चंप...

कन्तित-कीर्ति-कौमुदी सम्मान

 कन्तित-कीर्ति-कौमुदी सम्मान 'कन्तित' स्थानवाचक संज्ञा है। यह एक प्राचीन हिन्दू तीर्थ और अनेक राजवंशों की राजधानी रहा है। पुराणों में कन्तित का उल्लेख 'कान्तिपुरी' के रूप में किया गया है। भारतीय इतिहास का एक ऐसा भी अध्याय है, जहाँ भारत की राजधानी कान्तिपुरी, अर्थात् कन्तित में स्थापित होती है। वह समय है यशस्वी मौर्य-शुंग-कण्व सम्राटों के बाद का, जिसे 'भारशिव-विन्ध्यक काल' (257-82 B.C.E.) कहते हैं। कन्तित को अपनी राजधानी भारशिव-नरेशों ने बनाया। भारशिव-शासक होशंगाबाद और जबलपुर के आरण्यक प्रान्त से निकलकर बघेलखण्ड होते हुए गंगा तक पहुँचे थे। सुप्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. काशीप्रसाद जायसवाल लिखते हैं– 'बघेलखण्डवाली सड़क से जो यात्री गंगा की ओर चलते हैं, वे कन्तित के उस पुराने क़िले के पास आकर पहुँचते हैं, जो मिर्ज़ापुर और विन्ध्याचल के क़स्बों के बीच में है। जान पड़ता है कि यह कन्तित वही है, जिसे विष्णु की कान्तिपुरी कहा गया है। इस क़िले के पत्थर के खम्भे के एक टुकड़े पर मैंने एक बार आधुनिक देवनागरी में 'कान्ति' लिखा हुआ देखा था। यह गंगा के किनारे एक बहुत बड़...

क्षत्रिय जो भार्गव वंश में सिम्मलित हुआ वह राजा दिवोदास का पुत्र मित्रयु था।

 क्षत्रिय जो भार्गव वंश में सिम्मलित हुआ वह राजा दिवोदास का पुत्र मित्रयु था। मित्रयु के बंशज मैत्रेय कहलाये और उनसे मैत्रेय गण का प्रवर्तन हुआ। भार्गवों का तीसरा क्षत्रिय मूल का गण वैतहव्य अथवा यास्क कहलाता था। यास्क के द्वारा ही भार्गव वंश अलंकृत हुआ। इन्होंने निरूक्त नामक ग्रन्थ की रचना की। परशुराम के शत्रु सहस्रबाहु के प्रपौत्र का नाम वीतहव्य था। उसका कोई वंशज पुरोहित बनकर भार्गवों में सिम्मलित हो गया और उसके वंशज वैतहव्य अथवा यास्क कहलाने लगे। भार्गवों का चौथा क्षत्रिय मूल का गण वेदविश्वज्योति कहलाता है। इसका इतिहास ज्ञात नहीं है। इस प्रकार भार्गवों में छ: गण हो गये। गण वहिविवाही वर्ग को कहते है, अर्थात् एक गण के व्यक्ति आपस में विवाह नहीं कर सकते थे

स्कन्द पुराण ने भौगोलिक आधार पर ब्राह्मणों की 10 जातियां बताई हैं,

 स्कन्द पुराण ने भौगोलिक आधार पर ब्राह्मणों की 10 जातियां बताई हैं, जिनमें 5 विन्ध्य पर्वत के उत्तर की हैं, और 5 दक्षिण की 1 उत्तर भारत की 5 जातियां सारस्वत, गौड़, कान्यकुब्ज, मैथिल और उत्कल है। कुरु अथवा गुड़ प्रदेश आर्य सभ्यता का केन्द्र माना जाता था। अत: उसके नाम पर ये सभी ब्राह्मण सामान्य रूप से पंच गौड़ कहलाये दक्षिण के प्रदेशों के ब्राह्मण सामान्य रूप से पंच द्रविड़ कहलाये। इसी प्रकार भार्गव गोत्री गौड़ ब्राह्मणों का एक समूह कुंडिया कहलाता है तो दूसरा धूसर, ढसिया अथवा ढोसीवाला कहलाता है।  आदि गौड़ ब्राह्मणोत्पत्ति में उल्लिखित धूसर, ढूसिया अथवा ढोसीवाला ही आधुनिक ढूसर भार्गव हैं। ढूसर भार्गवों का एक पृथक समुदाय के रूप में सर्वप्रथम 16 श. में मुगल सम्राट अकबर के समय में मिलता है। ये गौड़ ब्राह्मणों से पृथक थे। 16 श.से पहले भी ढूसर भार्गवों का उल्लेख मिलने की विपुल सम्भावना है। हरियाणा के नारनौल ग्राम के पास स्थित ढोसी नामक ग्राम के पास भार्गवों के आदि पूर्वज महिर्ष च्यवन का आश्रम था। इसी ढोसी के निवासी भार्गव ढूसर कहलाये। इसका पुष्ट प्रमाण 18 शण् के उत्तरार्द्ध में रचित `...

अयोध्या राममंदिर निर्माण के समय ख़ुदाई के पश्चात मिले गहड़वाल कालीन प्राचीन अवशेष

 #अयोध्या राममंदिर निर्माण के समय ख़ुदाई के पश्चात मिले गहड़वाल कालीन प्राचीन अवशेष || श्री रामचंद्र जी के वंशज राष्ट्रकूटवंश की शाखा गहड़वाल वंश के समस्त सम्राटों का अयोध्या, मथुरा व काशी से विशेष लगाव रहा || गहड़वाल वंश के प्रतापी सम्राट महाराजा चंद्रदेव, महाराजा मदनपाल, महाराजा गोविंद्रचंद्र गहड़वाल, महाराजा विजयचंद्र व महाराजा जयचंद्र जी ने अयोध्या का चतुर्दिक विकास किया था || महाराजा जयचंद्र जी के पिता महाराजा विजयचंद्र जी ने अयोध्या राम मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था,जिसे अन्ततः महाराजा जयचंद्र जी ने पुर्ण किया था || गहड़वाल के प्रतापी नरेशों ने अयोध्या, मथुरा ,काशी, प्रयाग सहित अन्य स्थलों मे हजारो तीर्थ स्थलों का निर्माण करवाया था !! गहड़वाल वंश के प्रतापी नरेशों के शौर्य और प्रताप का अनुमान आप इससे लगा सकते है कि,जब तक कन्नौज व काशी पर गहड़वाल वंश का शासक था कोई भी बाहरी आक्रांता अयोध्या,मथुरा या काशी मे पैर भी नही रख पाया || जिस आक्रांता ने इन तीर्थस्थानों की तरफ नजर भी उठाया गहड़वाल वंशी नरेशों ने उसका विनाश कर दिया ,धर्म की राष्ट्र की रक्षा के लिए उन्होने खून की नदियाँ ...

महिर्ष भृगु ने अपनी श्री नाम की कन्या का पाणिग्रहण श्री विष्णु भगवान से किया था

 महिर्ष भृगु ने अपनी श्री नाम की कन्या का पाणिग्रहण श्री विष्णु भगवान से किया था। उस समय ब्रह्मा जी के सभी पुत्र, ऋषि एवं ब्राह्मण उपस्थित हुए। विवाहोपरान्त श्रीजी ने भगवान विष्णु से कहा- इस क्षेत्र में 12000 ब्राह्मण है, जो ब्रह्मपद की कामना करते हैं, इन्हें मैं स्थापित करूंगी और 36,000 वैश्यों को भी स्थापित करूंगी। और जो भी इतर जन होंगे वे भी भृगु क्षेत्र में निवास करेंगे उन सबकी अपने-अपने वर्णों में भार्गव संज्ञा होगी। भगवान विष्णु ने `एवमस्तु´ कहा। इस प्रकार भारतवर्ष में भृगुवंशी भार्गव, च्यवन वंशी भार्गव, औविवंशी भार्गव, वत्सवंशी भार्गव, विदवंशी भार्गव, निवास करते हैं। ये सभी भृगुजी की वंशावली में से `भार्गव´ है। उत्तरीय भारत में च्यवनवंशी भार्गव है। गुजरात में भार्गव जाति के चार केन्द्र है, भड़ौंच, भाडंवी, कमलज और सूरत। भिन्न-भिन्न क्षेत्र के भार्गव भिन्न-भिन्न नामों से जाने जाते हैं, जो इस प्रकार है- मध्यप्रदेशीय भार्गव- इनके गोत्र सं:कृत, कश्यप, अत्रि कौशल्य, कौशिक पूरण, उपमन्यु, वत्स, वशिष्ठ आदि हैं। प्रवरों में आंगिरस, कश्यप, वशिष्ठ, वत्स, गार्गायन, आप्नवान, च्यवन, शंडिल्...

भृगुवंशी राजपूत, जिन्हें भार्गव राजपूत भी कहा जाता है,

 भृगुवंशी राजपूत, जिन्हें भार्गव राजपूत भी कहा जाता है, ऋषि भृगु के वंशज माने जाते हैं। यह वंश, जो प्राचीन काल से ही भारत में मौजूद है, न केवल योद्धाओं के रूप में बल्कि विद्वानों और ऋषियों के रूप में भी प्रसिद्ध रहा है।  भृगुवंशी राजपूतों का इतिहास: मूल: भृगुवंशी राजपूतों का मूल ऋषि भृगु से जुड़ा है, जो सप्तर्षियों में से एक थे।  वंश: भृगु के पुत्रों में से एक शुक्र थे, जिनके वंशज दैत्यों के साथ थे, जबकि दूसरे पुत्र च्यवन ने भार्गव वंश को आगे बढ़ाया।  क्षत्रिय ब्राह्मण: कुछ भार्गव ब्राह्मण सूर्यवंशी क्षत्रिय थे, जिन्हें "क्षत्रिय ब्राह्मण" कहा जाता था, और ये वंश आगे चलकर भार्गव वंश का हिस्सा बना।  विभिन्न क्षेत्र: भृगुवंशियों ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाई, जिनमें उत्तर प्रदेश, राजस्थान और अन्य क्षेत्र शामिल हैं।  शिक्षा और ज्ञान: भृगुवंशी विद्वानों और ऋषियों के रूप में भी जाने जाते थे, और उन्होंने प्राचीन भारत के गुरुकुलों में शिक्षा और ज्ञान के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।  सामाजिक योगदान: भृगुवंशी राजपूतों ने न केवल युद्धों ...

नागार्जुनकोंडा शिलालेख इक्ष्वाकु शासन से संबंधित हैं

 नागार्जुनकोंडा शिलालेख, नागार्जुनकोंडा क्षेत्र में पाए गए अभिलेखों का एक समूह है जो 210-325 ईस्वी के आसपास के बौद्ध संरचनाओं और इक्ष्वाकु शासन से संबंधित हैं. ये शिलालेख बौद्ध धर्म और व्यापार के संदर्भ में प्राचीन भारतीय सभ्यता को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं.  नागार्जुनकोंडा शिलालेखों का महत्व: बौद्ध धर्म: नागार्जुनकोंडा शिलालेखों में बौद्ध धर्म के विभिन्न संप्रदायों, जैसे कि अपर महावन-शैल, और महायान पंथ के विकास का उल्लेख है.  इक्ष्वाकु शासन: ये शिलालेख इक्ष्वाकु राजाओं के शासनकाल, विशेष रूप से वीरपुरुषदत्त के शासनकाल के बारे में जानकारी प्रदान करते हैं.  कला और वास्तुकला: नागार्जुनकोंडा की कला और वास्तुकला स्थानीय और विदेशी प्रभावों के संश्लेषण को दर्शाती है, जो व्यापार के कारण सांस्कृतिक आदान-प्रदान का संकेत है.  धार्मिक प्रथाएं: नागार्जुनकोंडा के अवशेषों से उस समय की धार्मिक प्रथाओं, शैक्षिक प्रणालियों और सामाजिक-आर्थिक संरचनाओं के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है.  सांस्कृतिक आदान-प्रदान: नागार्जुनकोंडा स्थल प्राचीन भारत के सांस्कृतिक परिदृश्य को ...

कार्तिकेयपुर या कत्यूरी राजवंश | Kartikeyapur or Katyuri Dynasty in Hindi

  Knowledge Baba मुख्यपृष्ठ About Contact Buy Notes Categories eBooks Sitemap Terms of Use कार्तिकेयपुर या कत्यूरी राजवंश | Kartikeyapur or Katyuri Dynasty in Hindi   कार्तिकेयपुर या कत्यूरी राजवंश(Kartikeyapur or Katyuri Dynasty) (700-1050 ई) प्रारम्भिक राजधानी-कार्तिकेयपुर (जोशीमठ) द्वितीय राजधानी- बैजनाथ (बागेश्वर) शीतकालीन राजधानी- ढिकुली (रामनगर) राजभाषा- संस्कृत लोकभाषा- पालि कत्यूरी शासक नरसिंह देव ने राजधानी कार्तिकेयपुर से स्थानांतरित कर बैजनाथ में बनाई।  675 ई० के आस-पास मध्य हिमालय के सबसे बड़े राज्य ब्रह्मपुर का पतन हो चुका था।   इसी समय प्राचीन कुणिन्दों की एक शाखा उत्तर पश्चिमी गढ़वाल में अपनी शक्ति की वृद्धि में व्यस्त थी तथा अनेक लघु राज्यों को अधीन कर मध्य हिमालय में पुनः एक प्रबल शक्ति के रूप में सामने आई। इस वंश में कुल 14 नरेश हुए और इनके 9 अभिलेख  प्राप्त हुए है। इस प्रकार 700 ई० से लेकर प्रायः तीन शताब्दियों तक कार्तिकेयपुर राजवंश ने राज किया। इसे उत्तराखण्ड का प्रथम ऐतिहासिक राजवंश माना जाता है। इस राजवंश के अब तक कुल नौ अभिलेख प्राप्त हो ...